आज तीन दिन हो चुके हैं। लेकिन अभी भी उम्मीद की कोई किरन नजर नहीं आ रही। समझ में नहीं आ रहा कि क्या किया जाए। अभी कुछ ही महीने पहले बनी गली धंस चुकी है। गली में पानी के पाइपलाइन में नलों की कनेक्शन किए हुए हैं। सारी गली नाली का पानी रसने की वजह से धंस चुकी है। गली धंस से टूंटियों के पाइप लीक होने लगे हैं जिससे पानी गली के उपर आ गया है। गली में आने जाने वाले टूंटियो को दोष दे रहे हैं। में फैसला किया कि कल सुबह गली में गढ्डा खोद कर पाइप को ठीक किया जाए। अगले दिन सुबह ही मैंने गढ्डा खोदना शुरू कर दिया। चाचा जी की टूंटी भी वहीं पास में थी, इसलिए वो भी अपनी टूंटी वाला गढ्डा खोदने लगे।
मैं खोदता जा रहा था, अभी एक फुट ही खोदा होगा, कि मेरी कस्सी एक पाइप से जाकर टकराई और पाइप पर लगा बैंड टूट कर उपर आ गया। मुझे लगा कि में पाइप लाइन आ गई है। चाचा ने बताया कि ये में पाइप नहीं है, ये उपर डाली हुई टूंटी का पाइप है। में पाइप लाइन तो अभी पांच फुट गहरा है। मैंने भाई को कहा कि तुम उस प्लम्बर को फोन कर दो जिसने ये टूंटी लगाई थी। वो ही आकर इसे ठीक करेगा। तब तक मैं गढ्डा खोद देता हूं। कोई एक घंटे बाद ही प्लम्बर आ गया। तब तक मैं गली में गढ्डा सिर्फ दो फुट ही खोद पाया था।
गली में पत्थर और गटका निकल रहा था जिससे खोदने में परेशानी आ रही थी। प्लम्बर ने बताया कि पानी तो साइड में नाली से रिस रहा है। उसने बताया कि में पाइप लीक नहीं है। इसे और मत खोदो। उसके कहने पर मैंने गढ्डा खोदना बन्द कर दिया। जो बैंड टूट गया था, दुकान से मंगवा कर उसे लगवा दिया। फिर हमने गढ्डा ऐसे ही छोड़ दिया। उसने कहा था कि इसे एक दिन ऐसे ही छोड़ दो, अगर पानी लीक हुआ तो कल तक पता लग जाएगा।
लोगों को आने जाने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा था। गढ्डा खुदने से उनके निकलने पर रोक जो लग गई थी। लेकिन हमने बाइक, साइकिल निकलने के लिए थोड़ी जगह बना दी। शाम तक मैं कई बार उस गड्ढे को देख चुका था। शाम तक गड्ढे में पानी नहीं भरा था। तभी घर पर चाची जी आई और बताया कि गढ्डा भर रहा है। मैंने जाकर देखा तो पानी सिर्फ इतना ही था। पहले तो में डर गया कि अगर पानी लीक हुआ तो पांच फुट खोदना पड़ेगा। दो फुट खोदने में तो जान निकल गई। पांच फुट खोदना है तो कैसे जुड़ेगा। गटके ओर पथरों की वजह से खोदने में परेशानी आती है। अगले दिन सुबह मैंने जाकर देखा तो गढ्डा पानी से भर चुका था। आसपास वाले कहने लगे कि गढ्डा तो खोदना पड़ेगा। पाइप ही लीक है।
चलो मैंने मन बना लिया कि खोद ही लेते हैं। शक निकाल जाएगा। मैंने जैसे तैसे करके दोपहर तक गढ्डा पांच फुट तक खोद दिया। पाइपलाइन दिखाई दिन लगी थी। गड्ढे में पानी भर जाता तो डिब्बे की मदद से बाहर निकलता और फिर आगे खोदना शुरू करता। फिर मैंने पानी पूरा खाली कर दिया। फिर हमने प्लम्बर को फोन किया कि आपको आकर पाइप देखना होगा। वो कलंप के पास से लीक हो रहा है। दोपहर बाद 4 बजे वह गढ्डा देखने आया। उसने गड्ढे में देखा और पानी कि लीकेज बन्द करने की कोशिश की। थोड़ी देर में ही उसने हार मान ली। वो बाहर आ गया और कहा कि ये पानी बन्द नहीं होगा। मेन पाइपलाइन ही खराब है। उसको ही बदलवा लो। हमारे गांव के सरपंच के पिताजी भी वहीं खड़े थे। उन्होंने कहा कि चलो हम लिख कर शिकायत भेज देंगे, फिर पाइपलाइन बदलवा देंगे।
उसके बाद तीसरा दिन हो चुका था गढ्डा खुदे हुए। लेकिन कोई हल नहीं निकल सका। फिर हमने सोचा कि खुद ही कोशिश कर के देख लेते हैं। मैं गड्ढे में उतर गया। पहले सारा पानी बाहर निकाला। मेरे साथ मेरे चाचा का लड़का संजय, ताया जी का लड़का छज्जू भी वहीं खड़े थे। वो सभी मुझे बता रहे थे कि अब क्या करना होगा। फिर छज्जू चाबियां ले आया। मैंने क्लंप खोल दिया। तभी पाइप में से पानी का प्रेशर आने लगा। एक ट्यूब।काटकर मैंने क्लंप के नीचे लगाई और क़लंप को टाइट कर दिया। कई बार कोशिश करने के बाद भी पानी कि लीकेज बन्द नहीं हो रही थी। देर हो चुकी थी। कभी क़लंप खोलता, कभी टाइट करते। पानी भी भर रहा था।
एक बार तो नट लगते हुए नट मेरे हाथ से ही छूट कर पानी में गिर गया। मुझे लगा कि अगर अब पानी में से नट नहीं मिला तो और मुश्किल हो जाएगी। क्यूंकि पानी में गारा, पत्थर कंकड़ भी पड़े थे। काफी मुशकत के बाद खैर मुझे नट मिल गया। फिर मैंने क़लंप के नीचे ट्यूब का टुकड़ा लगाकर टाइट कर दिया। अब लग रहा था कि पानी की लीकेज काफी हद तक कम हो गई है। तभी वाटर सप्लाई वाले ने बताया कि मेन पाइप डलवा देंगे। तुम गढ्डा खुला रहने दो। फिर शाम को फोन किया की अभी एक हफ्ता लग जाएगा। अब आप देख लो कैसे करना है।
फिर हमने सोचा कि ऐसे तो बन्द नहीं होगा। पानी तो कम हो ही गया है, गढ्डा बन्द कर देते हैं जिससे रास्ता तो खुल जाएगा। एक हफ्ता और ऐसे ही निकाल लेते हैं। मिट्टी डाल कर गढ्डा बंद कर दिया गया। अगले दिन सुबह एक ट्रैक्टर वहां से निकलने की डर थी, कि पानी फिर से मिट्टी को लांघता हुए ऊपर आ गया। जैसे हमें चिढ़ा रहा हो कि तीन दिन मशकत के बाद भी यही कुछ होना था। गली के पास बैठा पानी को देखता रहा और सोचता रहा कि तीन दिन ऐसे ही मेहनत की। जब परिणाम यही आना था तो ऐसे ही गारे में गारा हुआ मैं। वो भी एक दो नहीं, तीन दिन। अब तो सरकार की तरफ ही नज़रें लगी हैं कि कितने दिनों में पाइपलाइन डालते हैं। कहीं इस बार भी सिर्फ लारा है तो नहीं है।
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