Thursday, March 29, 2018

वीसीआर भी एक बहाना था इकठे बैठने का.....


जब सबसे पहले टीवी आये, तो B/W टीवी भी बहुत अच्छे लगते थे। टीवी होना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी। किसी के घर में टीवी का होना उसका अमीर होना दर्शाता था। जिसके घर में रंगीन टीवी होता था, वो रईस की श्रेणी में आता था। पहले किसी को ये भी अंदाज़ा नहीं था कि टीवी रिमोट के साथ भी चल सकता है। 
जब रिमोट का ज़माना शुरू हुआ तो देख कर अचंभा लगता था कि इतनी दूर से बिना छुए टीवी शुरू और बंद कैसे हो जाता है। जैसे कोई जादू काम कर रहा हो।वायरलेस का तो नाम भी नहीं सुना था। जब किसी की शादी होती थी, तो उसकी शादी की कैसेट ज़रूर बनती थी। शादी के महीने बाद कैसेट तैयार हो कर मिलती थी। पहले वीसीआर वाली कैसेट होती थी, जो सिर्फ वीसीआर में ही दिखती थी। और हर किसी के घर वीसीआर नहीं होता था। किराये पर ले कर आते थे। फि जमाना बदला, कैसेट की जगह सीडी ने ले ली। फिर सीडी भी सीडी प्लेयर में ही चलती थी। वो भी किराये पर ले कर आते थे।

 धीरे धीरे सभी अपने घर में सीडी प्लेयर रखने लगे। फिर डीवीडी प्लेयर आये, सबकी क्वालटी बढ़िया होती जाती थी। आज तो एक छोटी सी नाख़ून जितनी चीज़ में ये सब चीजें आने लगी। जेब में पड़ी हुई भी किसी को पता नहीं चलता, पेन ड्राइव। जितनी छोटी है, अंदर से उतनी ही बड़ी।  पर आज उस ज़माने वाली बात नहीं, जो वीसीआर किराये पर लेकर कैसेट देखते थे। हमारे गांव में एक तो चिड़ीमार के पास होता था वीसीआर और दूसरा नाथ झूर के लड़के के पास होता था। वो टीवी ठीक करने का काम करता था। जिस दिन कैसेट देखनी होती थी वीसीआर में, उस दिन सभी अपने घर के काम जल्दी निपटा लेते थे। 

पड़ोस में भी बोल देते थे कि आज कैसेट लगेगी, सब आ जाना। एक दिन पहले वीसीआर बुक करना पड़ता था, कि कहीं कोई  और न बुक करके ले जाये। हम दो तीन बन्दे जा के वीसीआर लेकर आते थे।  हमारे घरों में B/W टीवी होता था। कैसेट देखना का मज़ा रंगीन टीवी में ही आता था। टीवी भी उसका ही लाते थे। टीवी बहुत बड़ा होता था, आजकल तो दिवार पर लगे हुए भी पता नहीं चलता। पतली पतली LEd आ गयी हैं। रस्ते में जो भी मिलता, वो पूछता कि आज किसके घर लगेगा। फिर वो भी पहुंच जाता। गांव के लड़कों को दूसरे की शादी की कैसेट देखने का मन नहीं होता था, क्यूंकि उसकी फोटो नहीं होती थी उसमें। 


उनको पता होता था कि एक कैसेट लगाने के बाद फिल्में लगेंगी। उस समय तबाही, बदला जट्टी दा, धर्मवीर, मैदान ए जंग, बहुत सारी फिल्में चलती थी। घर पर आ कर टीवी और वीसीआर लगा देना। मंजे बिछा देने, छोटे बच्चों के लिए पल्ली बिछा दी जाती थी। वीसीआर वाला ऐसा लगता था, जैसे कोई मेहमान आया हो, उसको एक मंजा बिछा के दे देते थे। वो सो जाता था। वीसीआर का रिमोट वो किसी को नहीं देता था। जब कैसेट आगे या पीछे करनी हो तो उसको ही उठाते थे। चिड़ीमार हमारे पड़ोस में ही रहता था, इसलिए वो रिमोट हमें दे देता था। और हम रिमोट लेकर अपने आप को सबसे खास महसूस करते थे। रिमोट की ज़रूरत भले ही काम पड़ती हो, पर पूरी रात रिमोट हाथ में ही रखते थे,  कि कहीं निचे उसको मिटटी न लग जाये। पूरी तरह संभाल कर रखते थे।  


पूरी रात में 3  कैसेट दिखती थी। पड़ोस में पता चले कि फलाने के घर वीसीआर लगेगा, सभी पहुंच जाते थे वहां। सवेरे उठकर आते थे घरों से। पड़े रहते थे पल्ली पर सारी रात। कई बार तो एक भी फिल्म पूरी नहीं देख पाते थे, नींद आ कर घेर लेती थी। आज तो वीसीआर किसी के पास भी नहीं रहे। सब के घरों में LEd  लगी हुई हैं। शादी की कैसेट या कोई फिल्म देखनी हो तो पेन ड्राइव लगा कर अपने अपने घर में देख लेते हैं। पहले वीसीआर के बहाने सभी एक जगह इकठे हो कर बैठ जाते थे। पर आज वो बहाना भी ख़त्म हो गया है। आज के ज़माने में हो रहे विकास ने रिश्ते भी ख़त्म से कर दिए हैं।


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