Wednesday, March 7, 2018

ये उन दिनों कि बात है

चंडीगढ़ के एक पार्क में बेंच पर खींची हुई तस्वीर 


                 आज पहली बार ब्लॉग लिखने की कोशिश कर रहा हूँ पता नहीं क्या होगा. मन में बहुत से सवाल उठ रहे हैं. लिखने के लिए विचार कहाँ से लाऊंगा. आज लिख दिया. कल कहाँ से लिखूंगा. ऐसे ऐसे सवालों ने मन में एक डर सा पैदा कर दिया है. पर चलो कल की कल देखेंगे. आज तो लिखूं.
दोस्तों मेरा नाम सुरेश कुमार है. पर ज़्यदातर दोस्त मुझे सिर्फ शर्मा कहकर ही बुलाते हैं. और तो और उनमे से कुछ को तो पता भी नहीं होगा की मेर नाम सुरेश है. मैं अब जीवन बिमा का एजेंट हूँ. मैंने 2011 में जीवन बिमा की एजेंसी ली थी. मैं चंडीगढ़ शहर में रहता हु. वैसे तो मेरा जन्म हरियाणा राज्य के अम्बाला जिले में पड़ने वाले एक गांव सोँटा में हुआ था. मेरे परिवार में मेरे पिता जी, मेरी माता जी, मेरी दो बहनें और एक छोटा भाई हैं. 8th की पढ़ाई मैंने गांव के ही प्राइवेट स्कूल से की है. उसके बाद मने 9th और 10th  की पढ़ाई गांव के ही सरकारी स्कूल से की है. गांव में 10th तक ही स्कूल होने की वजह से पास के गांव ठोल में 11th और 12th की पढ़ाई पूरी की. घर के हालत ज्यादा अच्छे न होने की वजह से आगे की पढ़ाई नहीं कर सका. घर वालों को भी जल्दी थी की अपनी पढ़ाई पूरी करके घर के गुजारे के लिए कमाना शुरू कर दे. उसके बाद मेरे जीजा जी ने मुझे चंडीगढ़ बुला लिया. मेरे जीजा जी चंडीगढ़ में एक अख़बार के दफ्तर में गाडी चलाते थे. उन्होंने मुझे भी अपने दफ्तर में लगवा दिया. मैंने कंप्यूटर बेसिक ही सीखा था. वैसे कम्प्पूटर सिखने के लिए मैं अम्बाला शहर में जाता था, वो भी बहुत मजेदार है किस्सा. आज भी याद करता हु तो अपने आप ही हसने लगता हूँ. पुराणी बातें याद करके मन में फिर से वही जिंदगी जीने की इच्छा जागृत हो जाती है. चलो कंप्यूटर सिखने वाला किस्सा फिर कभी सुनाऊंगा. मैं 2013 में चंडीगढ़ में आया था. तब मुझे 1000 रूपये तनखाह मिलती थी. रहना भी वहीँ पर पड़ता था. उनके दफ्तर की देखभाल भी हो जाती थी. पहले 2 महीने 1000  रूपये तनखाह के बाद २००० रूपये कर दी. मुझे बहुत ख़ुशी हुई की मेरी तनखाह बढ़ा दी है. इतवार की छुट्टी के दिन मैं घर आ जाया करता था.  मुझे ऐसा लगता था जैसे कोई फौजी अपनी ड्यूटी से घर वापस आता है. और सोमवार को जब वापस जाना होता था तो ऑंखें भर आती थी. बस में बैठे हुए रोने लगता था. मुझे चंडीगढ़ जाना विदेश जाने जैसा लगता था. कभी घर से दूर रहे ही नहीं. ऐसे ही मैंने उस दफ्तर में 4  साल लगाए . उसके बाद मुझे कुछ कुछ समझ आने लगा था कि कुछ कमाने के लिए घर तो छोड़ना पड़ेगा.  वैसे चंडीगढ़ मेरे गांव से सिर्फ 50 किलोमीटर दूर ही पड़ता है. बस में जाने में 2 घंटे का सफर है. गांव में से अगर कोई चंडीगढ़ काम करता है तो उसको बहुत बड़ी बात मानते थे. मुझे भी बहुत ख़ुशी होती थी कि अभी मेरी शादी नहीं हुई और मैं कमाने भी लग गया हु. 3000 तनखाह बहुत मानी जाती थी. घर में सब खुश थे कि चलो कमाने लग गया है. आज इस बात को 15 साल हो गए हैं.

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