एक बार मैं चंडीगढ़ से घर गया हुआ था छुट्टी में । घर में B/W टीवी था। वो भी उस दिन खराब हो गया। मैंने टीवी को एक कपडे में बाँधा और साइकिल पर उसे ठीक करवाने के लिए पास के गांव ठोल में ले के जाने लगा। हमारे गांव में तब मकैनिक नहीं था। ठोल गांव 5 किलोमीटर पड़ता था। गर्मियों के दिन थे। मैंने कुरता पजामा डाला हुआ था। मैंने साइकिल उठाई और कंधे पर उस कपडे को लटका लिया जिसमे टीवी को बाँधा हुआ था। अभी थोड़ी दूर ही गया था कि मेरा पजामा साइकिल कि चेन में फंस गया। साइकिल के कुत्ते फेल थे, जिस कारन उसकी चेन रुकी नहीं और पजामे को और ज्यादा लपेट लिया। जिस करके मैं टीवी समेत सड़क पर गिर गया। मुझे तो कोई चोट नहीं आयी, पर मेरे कंधे पर लटका टीवी टूट कर चकनाचूर हो गया।
मुझे समझ नहीं आ रहा था कि अब मैं क्या करूं।वापस घर जाऊंगा तो घर में माँ से मार पड़ेगी। और मकैनिक के पास जाकर ठीक करवाऊं तो किसे, टीवी तो टूट गया। काफी देर सोचने के बाद मैंने टीवी को कपडे में इकठा किया और मकैनिक के पास जाना ही ठीक समझा। सोचा कि घर जाऊंगा तो मार पड़ेगी, मकैनिक के पास जाता हु, जाते हुए कुछ न कुछ सोच लूंगा। जाते हुए मेरे मन में ख्याल आ रहे थे कि अगर ये ठीक न हुआ तो घर आ के क्या कहूंगा। मन में पहले से ही माँ से मार खाने पूरी कहानी त्यार हो चुकी थी।
सोच रहा था कि घर जा के टीवी वाला कपडा घर में रख कर बाहर चला जाऊंगा। जब पता चलेगा कि माँ का गुस्सा ठंडा हो गया है तो घर आ जाऊंगा। इतने में ठोल भी आ गया. और मकैनिक छतर के पास ले गया। उसको बोला कि टीवी टूट गया है और मुझे कोई दूसरा टीवी दे दो। उसने कपड़े में से टीवी निकल के देखा तो सब चूर चूर हो गया था। उसमे ठीक करने को तो कुछ बचा ही नहीं था। फिर उसने एक पुराना टीवी दिखाया। उसका रंग सफेद था। उसने मेरे टीवी में से जो कोई काम का पुर्जा था वो निकल के रख लिया और मुझसे 500 रूपये होर मांगे।
फिर मैंने उसको अगले इतवार को जब छुट्टी पर आऊंगा तो पैसे दे जाऊंगा बोल के टीवी ले लिया। घर जा के मैंने किसी को इस घटना के बारे में कुछ नहीं बताया। काफी दिनों के बाद ये बात घर में पता चली। पर तब तो गुस्सा करने का कोई फायदा ही नहीं था। वैसे भी मैं टीवी के बदले में टीवी ले ही आया था। आज भी कईं बार ये बात याद आती है तो अपने आप ही मेरे चेहरे पर मुस्कान सी बिखर जाती है। सोचता हूँ की वो दिन भी क्या दिन थे, गलतियां करके अपने आप को बचने कि तरकीबें सोचते थे। उस समय कि नादानियों पर हंसी आती है।

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