Tuesday, March 13, 2018
घर से स्कूल तक नाली यात्रा
हाहाहहाहा, .....
आप सोच रहे होंगे कि क्या हो गया, अभी बात शुरू भी नहीं की और हसने पहले ही लगा।
चलो आपको बताता हूँ कि मैं पहले क्यों हंसने लगा। बात उन दिनों की है, जब मैं गांव के प्राइवेट स्कूल में पांचवीं क्लास में पढता था। हमारे हैड मास्टर गांव भूंनी से स. नैब सिंह थे। हम उन्हें नैबा ही बुलाते थे। उनका स्कूल नैबे का स्कूल मशहूर था। उनसे सभी बच्चे बहुत डरते थे। जब वो सरकारी बस से उतरते थे, तो बस के निचे से उनके पैर देखकर पहचान लेते थे कि आ गया। बस का नाम भी काले मुंह वाली रख दिया था। पहले स्कूल गांव में खेड़े की थाई में बना हुआ था। मैं जब से स्कूल जाने लगा था, तभी से आनाकानी करता था। हमेशा लेट उठना, लेट तैयार होना, लेट स्कूल जाना। यही मेरी आदत बनी हुई थी। और यही आदत 12वीं क्लास तक रही। वैसे तो मैं कोई न कोई बहाना ढूंढता रहता था स्कूल से छुट्टी करने का। एक दिन मेरा मन नहीं था स्कूल जाने का। उस दिन मैं खेत में चला गया और काफी देर तक नहीं आया। स्कूल का टाइम हो गया था। जब काफी समय हो गया तो सोचा कि चलो आज की छुट्टी पक्की। पर मुझे क्या पता था कि होनी को कुछ और ही मंज़ूर था। मैं जैसे ही घर पहुंचा, मेरी माता जी ने मुझे देखा तो गुस्से से आग बबूला हो उठी। बोली कि चलो स्कूल। मैंने कहा कि अब तो लेट हो गया, पर वो कहाँ मानने वाली थी। उसने मुझे जैसे तैसे कपडे डाले, मुँह भी पता नहीं मैंने धोया था या नहीं, अब तो याद नहीं। स्कूल बैग के नाम पर थैले से सिला एक झोला होता था। झोला उठाया और स्कूल ले के जाने लगी। मैं अपना एक पैर पीछे खींचता था तो माता जी मुझे दो कदम आगे पटक देती थी। रास्ते में माता जी ने मुझे थपड मारा, जिससे मैं नाली में जा गिरा। गांव की नाली किसी नाले से कम नहीं होती थी। मैं कीचड़ में पूरी तरह से लीबढ़ गया था। लीबढ़ शब्द शायद आपको समझ न आये, लीबढ़ का मतलब कीचड़ में धंस गया था, कीचड़ मेरे ऊपर लग गया था। सिर से लेकर पैरों तक कीचड़ से सना हुआ था। पड़ोस की एक औरत जिसका नाम लीला था, (सोना की माता जी ) ने मेरी माता जी से कहा की "ए तेजो, मैंने तो आज देखा तेरा गुस्सा" । ऐसी ही हालत में मुझे स्कूल में मास्टर के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया। सब मुझे देख रहे थे। मास्टर गुलजार सिंह ने पूछा कि ये क्या हुआ। तब माता जी ने बताया की ये स्कूल नहीं आ रहा था। इसलिए इसको नालियों में से घसीटते हुए ले कर आयी हु। इसकी आधी छुट्टी भी बंद कर दो। तब मास्टर जी ने कहा की आज इसको ले जाओ, नेहलाओ, धुलाओ, कल से इसकी खबर लेते हैं। इसकी छुट्टी भी बंद कर देंगे। आज भी जब पड़ोस में कोई बचा स्कूल न जाने की जिद्द करता है, तो सब उसको यही बोलते हैं, कि तुमको भी नाले में से घसीटते हुए ले के जाना पड़ेगा, ऐसे नी तू पढ़ेगा। आज भी जब इस तरह की कोई बात करता है, तो आँखों के सामने वही नाला याद आ जाता है, जिसमे से मुझे स्कूल जाने की नाली यात्रा करवाई थी मेरी माता जी ने। उस दिन के बाद मेरा स्कूल से छुट्टी करना कम हो गया था।
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