Wednesday, March 14, 2018
कुवें में चवन्नी का दान
बचपन भी कैसा होता है, न कोई फ़िक्र, न कोई दुःख। हमेशा अपने मन की सुननी, और वही करना जो मन बोलता। ये भी नहीं सोचते थे की हमारे ऐसा करने से किसी को दुःख भी हो सकता है। किसी से हमें मार भी पड़ सकती है। सोचने समझने की शक्ति तो बहुत कम होती थी, तभी शायद ज़िंदगी आसान थी। आज के जमाने में दिमाग का इस्तेमाल ज्यादा होने लगा है, ज़िंदगी भी उतनी ही कठिन हो गयी है। एक बार गांव के कुंवे के पास हम खेल रहे थे। अब उस कुवें को जाल से ढक दिया गया है, पहले उसमें से पीने के लिए पानी इस्तेमाल करते थे। आज तो कुवें ख़त्म ही हो गए हैं। हम हम आस पास के लड़के दर्शन, पवन, छज्जू, और पड़ोस के लड़के भी थे। कुंवे को पूजा जाता था। वहीं खड़े किसी लड़के ने कहा कि कुवें में दान करना चाहिए। दर्शन के छोटे भाई पवन के पास अठ्ठनी थी। शायद उसे देखकर ही उस लड़के ने दान करने को बोला होगा। सबने कहा कि हां, अठ्ठनी में से कुछ पैसे कुवें में दान कर दे, तुझे आशीर्वाद मिलेगा। इतने में मैंने उसके हाथ से अठ्ठनी छीन ली और रामदिये कि दुकान पर चला गया। उससे कहा कि इस अठ्ठनी के खुले पैसे दे दो। उसने दो चवन्नियां दे दी। मैं वापस आया और उसे दो चवन्नियां देते हुए बोला कि देख मैं पैसे खुलवा लाया, अब दान कर दे। वो करना नहीं चाह रहा था। मैंने एक चवन्नी उसके हाथ में रख दी, और दूसरी उसे देने की बजाए कुवें में फेंक दी और माथा टेक लिया। इससे पहले की वो मुझे कुछ कहते मैं वहां से भाग गया। मेरे मन में ख़ुशी थी कि चवन्नी दान कर दी। चाहे वो पवन की ही क्यों ना हो। आशीर्वाद का कुछ हिस्सा तो मिलेगा मुझे भी। आज भी अगर ज़िंदगी उस तरह ही चलने लगे तो शायद आसान हो जाएगी ज़िंदगी। मेरी ज़िंदगी ।।।।
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