Wednesday, March 14, 2018

छुट्टियों में निक्कर में हुए दो सुराख़


स्कूल की छुट्टियों का इंतज़ार तो हर किसी को रहता है। चाहे वो स्कूल में पढता हो, या नहीं। कभी किसी को अपने मायके जाना हो तो उनका भी एक ही बहाना होता था कि जब बच्चों की छुट्टियां होंगी, तभी आएंगे। एक बार मुझे छुट्टियों में अपनी चाची जी के साथ उनके मायके जाने का मौका मिला। नाना जी और नानी जी सरसावा में रहते थे। नाना जी गन्ना मिल में काम करते थे। मिल की तरफ से उनको फ्लैट मिला हुआ था। सरसावा में गन्ना मिल के पास ही रहते थे। मैं , चाची, उनका बेटा दर्शन, पवन, और ताई जी का बेटा छज्जू एक साथ सरसावा गए। मेरी चाची और ताई दोनों सगी बहनें हैं। सरसावा ट्रेन से जाते थे। इससे पहले मैं कभी ट्रेन में नहीं बैठा था। अम्बाला कैंट से सरसावा की ट्रेन मिल जाती थी। गर्मियों के दिन थे, घर में तो टिकते ही नहीं थे। हर समय बाहर खेलते रहते थे। चाची जी ने हमें 10  - 10  पैसे दे के कहा कि जाओ दुकान से कुछ ले के खा लेना। हम बहुत खुश हुए। क्यूंकि उस समय 10  पैसे भी बहुत होते थे। हम दौड़ कर दुकान पर गए और हमने 10  पैसे की छोटी छोटी खाने की गोलियां ली। वो बहुत सारी आ गयी थी। जहाँ रहते थे, वो बिल्डिंग 3 -4  मंजिल थी। लिफ्ट तो होती नहीं थी। सीढ़ियों से ही चढ़ते थे। सीढ़ियों के साथ दीवार बनाई हुई थी। वो बहुत फिसलन वाली थी। हम सब ऊपर चढ़ के जाते थे और उस दीवार के ऊपर बैठ कर निचे आते थे। बहुत मज़ा आता था। ऐसे हम सुबह से शुरू करते थे, दोपहर तक, शाम तक घूमते रहते थे। मुझे याद है , माता जी ने नई निक्कर और कमीज सिल्वा के  दी थी। उस समय रेडिमेड का जमाना नहीं था। दरजी से कपडे सिल्वा के डालते थे। उन सीढ़ियों के ऊपर से घिसटते हुए आते थे, जिस कर के मेरी निक्कर के पीछे दोनों साइड दो सुराख़ हो गए। नई निक्कर का क्या हाल हो गया था। मैंने चुपके से वो कपड़ों के बीच में छुपा के रख दी। छुट्टियों में जितना मज़ा ले रहे थे, छुट्टियों का सारा नशा उतर गया। अब घर में पता चलेगा तो बहुत डांट और मार दोनों पड़ने वाली थी।

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