Thursday, March 22, 2018

साइकिल की क्रेंची, फिर डंडा, फिर उलटी क्रेंची, फिर पिछली सीट


आज हर कोई इतना व्यस्त हो गया है कि उनको अपने बचपन के दिन याद करने की भी फुर्सत नहीं है। अब कभी कोई बात याद आ जाये तो अकेले एंजोये भी नहीं कर कर सकते। जब सबसे पहले साइकिल चलाना सीखते हैं। साइकिल चलाते समय भी पहले कल्पना में साइकिल चलाता था। पहले क्रेंची चलाई, फिर डंडे पर चलाने लगा. एक बार कुल्हा इस साइड करना है, फिर दूसरी साइड। चलानी न भी आती हो, तो पैदल ही खींचते फिरते थे।  ऐसे ही चलाने लगा। 

उसके बाद तो साइकिल खेल ही हो गया था। कभी उलटी क्रेंची चलाना, कभी हैंडल से हाथ छोड़ कर, कभी हाथ बदल कर साइकिल चलाने लगा। कभी पिछली सीट पर बैठ कर, कभी हैंडल पर बैठ कर। हमारे गांव में एक लड़का है, उसको हम चिड़ीमार कहते थे, वो साइकिल से बहुत से करतब करता रहता था। उसको देखकर हमें भी लगता था कि हम भी ऐसा ही करेंगे। जैसे सर्कस में साइकिल को अलग अलग तरीके से चलाना होता है। कभी साइकिल की छलांग लगवाना।उसके बाद मैं जब सेक्टर 16  चंडीगढ़ में नौकरी करता था, ये 2004  की बात है। पहले दफ्तर सेक्टर 22 में होता था।  

जब मैंने नौकरी शुरू की। कंप्यूटर मेरे लिए नया था। तब मैं कंप्यूटर पर कोई भी काम करता था, बड़े शौक से करता था।  उस समय मुझे सुबह से दोपहर और दोपहर से शाम, फिर शाम से रात होने का पता भी नहीं चलता था।  पहले मैं 15 दिन बााद घर जाता था। इतवार की छुट्टी वाले दिन जब मैं घर नहीं जाता था, तब शनिवार को रात को मैं सारी रात कंप्यूटर पर काम करता रहता था। नए नए काम सीखता रहता था कंप्यूटर पर। कई बार तो ऐसा भी हुआ था कि रात से सुबह कंप्यूटर पर काम करते करते ही हो गयी थी। दफ्तर की गाड़ी थी बोलेरो। मेरे जीजा जी चलाते थे। इतवार कि छुट्टी को वो अपने घर पटियाला चले जाते थे। और गाड़ी दफ्तर में ही रहती थी। जब कोई नहीं होता था तो मैं गाड़ी को लेकर सेक्टर 16 कि छोटी छोटी छोटी सड़कों पर निकल जाता था। उससे पहले मैंने कभी गाड़ी नहीं चलाई थी। 

एक दिन मैं गाड़ी ले के निकल गया और पुरे सेक्टर 16  में घूमने के बाद गाड़ी को वापस दफ्तर में खड़ी करने लगा। मैं गाड़ी को बैक कर रहा था। पीछे किसी की गाड़ी खड़ी थी मारुती कार। मैंने देखा नहीं, पीछे जाकर उस कार में लग गयी। खिड़की में छोटा सा डेंट पद गया। पर मैंने वो डेंट गाड़ी को खड़ी करने के बाद देखा। मैंने आसपास देखा, कोई नहीं था। मैंने शुक्र मनाया कि किसी ने नहीं देखा। और चुपके से दफ्तर के अंदर चला गया। उसके बाद जब कभी मौका मिलता, मैं गाड़ी चलाने लगा। फिर जीजा जी को भी बताया कि मैं गाड़ी चला लेता हूँ। इस तरह से मेरा हौसला बढ़ गया था। 

कई बार दोस्त पूछने लग जाते हैं कि कहां से सीखी गाड़ी चलानी। तो बोल देता हूँ कि अपने आप ही चलाने लग गया। वैसे कई बार दुर्घटना भी हुई। पर सब ठीक ठाक रहा। पर अब वो बातें ही नहीं रही। अब भी दिल करता है कि इस व्यस्त ज़िंदगी से कुछ समय निकाल कर बचपन के दिनों में खो जाएँ।

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