आज शादी की कोई बात चलती है तो एकदम से लड्डू का कड़ाहा आँखों के सामने घूम जाता है। क्यूंकि शादी की शुरुआत यहीं से होती थी। लड्डू बनाने के लिए बड़े बड़े कड़ाहे ले के आते थे। जिस घर में कोई कड़ाहा पड़ा हुआ मिल जाता था, उसे देखकर यही दिमाग में आता था कि इनके घर में कोई शादी है। जिस दिन हलवाई आ के अपना काम शुरू कर देता था तो शादी शुरू हो जाती थी। जब घर या पड़ोस में कोई शादी होने वाली होती थी तो ऐसे लगता था कि हमारी तो मौजें हो जाएँगी। स्कूल से छुट्टी लेने की भी ख़ुशी होती थी। शादी से 4 -5 दिन पहले हलवाई आ जाता था।
आस पड़ोस में एक एक बन्दे को भठ्ठी पर आ जाने के लिए बोला जाता था। आस पड़ोस से बजुर्ग आ कर इकठे हो जाते थे। भठ्ठी पर काम करने वालों को चाय और नाश्ता दे के काम शुरू कर दिया जाता था। सभी दिल से काम करते थे। किसी के मन में कोई भेदभाव नहीं होता था। सब इकठ्ठे बैठ कर गप्पें लड़ाते रहते थे। हसी मज़ाक चलता रहता था। कोई गुस्सा भी नहीं करता था। मुझे याद है, मेरी शादी में 1 महीने पहले ही चाचे, ताये, भाई, सब इकठे हो गए थे। हमारे चौबारे वाले कमरे में ताश खेलना शुरू कर दिया था।
ये कार्यक्रम शादी के बाद भी 15 दिन तक चलता रहा था। सुखदेव चाचा, रामजी लाल ताया, गुड्डा चाचा, नछतर पाल चाचा, गोरा चाचा, सलिंदर चाचा, गुरमेल चाचा, नरमेल, धर्मबीर चाचा, बड़ा कला सभी ताश खेलते थे। आज कल तो ये सब ख़त्म होता जा रहा है। सबसे पहले तो हलवाई का काम ख़त्म होता जा रहा है। सभी रेडीमेड मिठाई मंगवा लेते हैं। आज ना कोई किसी को भठ्ठी के लिए बुलाता है, और ना ही कोई आता है। आज किसी के पास टाइम भी नहीं होता। एक समय होता था जब आस पास के लोग अपने घरों से दूध इकठा करके शादी वाले घर में दे के जाते थे। सबको पता होता था कि मेहमानों को आना है, दूध की ज़रूरत भी पड़ेगी। वो अपने आप ही आ के पूछते थे, कि अगर कोई ज़रूरत पड़े तो बेझिझक बोल देना।
गांवों में सब का काम साँझा माना जाता था। आज तो शादी वाले दिन ही पता चलता है कि फलाने के घर में शादी है। पड़ोस वालों को भी पता नहीं चलता कि पड़ोस में किस बात का फंक्शन है। आज तो हालत ऐसे होते जा रहे हैं, कि टब्बर में क्या हो रहा है, दूसरों से पता लगता है। आज कल की शादियों की बात सुनकर वैसा महसूस ही नहीं होता, जैसा पहले होता था। जैसे हमारे लिए तो उसी दिन से शादी शुरू हो जाती थी।

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