(एक सर्द रात की यादगार यात्रा)
लोहड़ी सिर्फ एक त्योहार नहीं,
बल्कि ठंड के बीच गर्माहट बाँटने का एहसास है।
जब आग के चारों ओर लोग इकट्ठा होते हैं,
तो सिर्फ लकड़ियाँ नहीं जलतीं,
दिलों में भी अपनापन सुलग उठता है।
इस बार की लोहड़ी कुछ अलग थी।
ऑफिस का माहौल, दोस्तों की हँसी,
गीत-संगीत, नाच-गाना
और फिर…
एक लंबा, धुंध से भरा सफ़र,
जो ज़िंदगी की तरह अनिश्चित था।
ऑफिस में लोहड़ी का जश्न
लोहड़ी वाले दिन ऑफिस में काम से ज़्यादा उत्साह था।
सभी ने मिल-जुलकर लोहड़ी मनाई।
आग जलाई गई, उसके चारों ओर खड़े होकर किसी ने गीत गाए,
किसी ने तालियाँ बजाईं, तो कोई नाचने से खुद को रोक नहीं पाया।
ठंडी हवा के बीच आग की गर्माहट और साथियों की हँसी
पूरा माहौल जीवंत कर रही थी।
लगभग एक घंटे तक काम की फाइलें भूलकर
हम सब त्योहार में डूबे रहे।
उस एक घंटे में ऑफिस सिर्फ कार्यस्थल नहीं,
एक परिवार जैसा लग रहा था।
रात 10 बजे: सफ़र की शुरुआत
रात करीब 10 बजे काम खत्म हुआ।
मैं ऑफिस से घर के लिए निकल पड़ा।
जैसे ही बाहर आया, महसूस हुआ कि
धुंध आज कुछ ज़्यादा ही गहरी है।
मोहाली शहर के अंदर तक सब कुछ ठीक था।
स्ट्रीट लाइट्स थीं, गाड़ियाँ थीं,
और रास्ता पहचाना हुआ था।
लेकिन जैसे ही शहर की सीमा पार की,
धुंध ने मानो सारी दुनिया को निगल लिया।
धुंध: जब रास्ता दिखना बंद हो जाए
अब हालात बदल चुके थे। आगे कुछ भी साफ़ दिखाई नहीं दे रहा था।
हेडलाइट्स भी धुंध में बेबस लग रही थीं।
लगभग दो घंटे का सफ़र था। अंबाला तक का रास्ता
सीधा होने के कारण थोड़ी राहत देता रहा।
लेकिन ठंड…
ठंड तो जैसे हड्डियों में उतर चुकी थी।
हाथ-पैर सुन्न होने लगे थे, और शरीर मानो
जमा हुआ सा महसूस हो रहा था।
हाईवे, डायवर्जन और डर
अंबाला पार करते ही हाईवे पर फोरलेन का काम चल रहा था।
जिसकी वजह से जगह-जगह रास्ता डायवर्ट किया गया था।
जहाँ सड़क पर सफेद पट्टियाँ बनी थीं,
वहाँ तक तो गाड़ी संभल जाती थी।
लेकिन जहाँ कोई निशान नहीं था,
वहाँ से निकलना किसी परीक्षा से कम नहीं था।
धुंध इतनी घनी थी कि यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो रहा था
कि आगे सड़क है या कोई मोड़।
मटेड़ी का पुल: भ्रम और भरोसा
मटेड़ी पहुँचकर जब मैं पुल पर चढ़ा, तो मन में एक अजीब सा डर बैठ गया।
इतना लंबा पुल पहले नहीं देखा था। धुंध की वजह से आसपास कुछ भी साफ़ नहीं दिख रहा था।
एक पल के लिए ऐसा लगा कि कहीं मैं गलत रास्ते पर तो नहीं आ गया?
लेकिन फिर मैंने खुद को संभाला और आगे बढ़ता रहा।
कुछ दूरी तय करने के बाद पुल से उतरा और थोड़ा आगे गया,
तो रास्ता पहचान में आया।
तभी समझ आया कि मटेड़ी वाला नया पुल
अब चालू हो चुका है, और मैं सही रास्ते पर ही था।
राहत और बढ़ती ठंड
इसके बाद जहाँ सड़क सही थी, वहाँ चलना आसान हो गया।
लेकिन ठंड अब चरम पर थी। हाथ-पैर पूरी तरह
सुन्न हो चुके थे। शरीर थक चुका था, लेकिन रुकना विकल्प नहीं था।
गाँव वाली सड़क पर पहुँचते ही धुंध और भी घनी हो गई।
ऐसा लग रहा था जैसे कोई सफेद दीवार सामने खड़ी हो।
घर की देहरी: सुकून की साँस
किसी तरह धीरे-धीरे घर पहुँचा।
घर में कदम रखते ही सबसे पहले गीले, ओस में भीगे कपड़े बदले।
फिर एक कप गरम-गरम चाय पी।
उस चाय के हर घूँट में सुकून था, राहत थी, और यह एहसास था कि सफ़र पूरा हुआ।
रजाई ओढ़कर जैसे ही लेटा,
तो लगा — आज की रात हमेशा याद रहेगी।
📌 Calling Lines (सोचने वाली पंक्तियाँ)
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हर सफ़र मंज़िल से ज़्यादा, इंसान को मजबूत बनाता है।
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धुंध सिर्फ रास्तों पर नहीं होती, ज़िंदगी में भी आती है।
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जब कुछ दिखाई न दे, तब भी चलते रहना ही हिम्मत है।
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घर की गर्म चाय, दुनिया की सबसे बड़ी राहत होती है।
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हर मुश्किल रात के बाद, सुकून भरी सुबह ज़रूर आती है।
लोहड़ी की आग से शुरू हुआ यह दिन धुंध भरी रात में खत्म हुआ।
जहाँ शुरुआत में हँसी, गीत और अपनापन था, वहीं अंत में
ठंड, डर और धैर्य की परीक्षा।
लेकिन यही तो ज़िंदगी है। कभी उजाला, कभी धुंध।
जरूरी यह नहीं कि रास्ता साफ़ दिखे, जरूरी यह है कि हम चलते रहें।
क्योंकि
जो चलना जानता है,
वो अंधेरे और धुंध से भी
रास्ता निकाल ही लेता है।






