सर्दियों की लंबी रातों में जब ठंडी हवाएँ हड्डियों तक चुभती हैं, तभी कहीं गाँव–शहरों के आँगनों में एक आग जलती है — लोहड़ी की आग।
यह सिर्फ लकड़ियाँ जलाने का नाम नहीं, बल्कि
रिश्तों की गर्माहट, मेहनत की मिठास और उम्मीद के गीत का त्योहार है।
लोहड़ी हमें याद दिलाती है कि चाहे ठंड कितनी भी सख़्त हो,
साथ होने से हर मौसम आसान लगने लगता है।
खेतों की खुशी और किसान की मुस्कान
लोहड़ी का असली अर्थ समझना हो तो खेतों में जाइए।
कड़कड़ाती सर्द रात में भी किसान की आँखों में चमक होती है —
क्योंकि फसल खड़ी है, उम्मीद खड़ी है।
रात होने पर जब घर–घर से आवाज़ें आने लगती हैं —
“सुंदर–मुंदरिए… तेरे मुंडे दी…”
तो लगता है जैसे पूरा गाँव एक ही परिवार बन गया हो।
गुड़, रेवड़ी, मूंगफली और गजक बाँटते समय
सिर्फ मिठाई नहीं बाँटी जाती —
अपनापन, प्यार और दुआएँ भी बाँटी जाती हैं।
लोहड़ी की आग — परेशानियों को राख कर देती है
जब सब लोग आग के चारों ओर घूमते हैं,
तो ऐसा लगता है जैसे हर व्यक्ति
अपनी चिंताओं, दुःखों और डर को
उस आग में डालकर हल्का हो रहा है।
लोहड़ी सिखाती है —
“जलाने लायक चीज़ें — नफ़रतें, शिकायतें और पुरानी कड़वाहट हैं…
रिश्ते नहीं।”
और इसी आग के पास बैठकर
बुज़ुर्ग कहानियाँ सुनाते हैं, बच्चे नाचते हैं,
और घर की औरतें नई फसल के लिए दुआ करती हैं।
नया मौसम, नई उम्मीदें
लोहड़ी के बाद आने वाली सुबह
मानो संदेश देती है —
अब ठंड कम होगी, मेहनत रंग लाएगी,
और ज़िंदगी फिर से मुस्कुराएगी।
यह त्योहार हमें जोड़ता है —
गाँव से, मिट्टी से, परिवार से और अपनी जड़ों से।
लोहड़ी का असली आनंद वहीं मिलता है
जहाँ लोग सिर्फ आग नहीं जलाते,
बल्कि अपने दिलों में प्यार भी जलाए रखते हैं।
इस साल जब आप लोहड़ी मनाएँ,
एक छोटा-सा काम ज़रूर करें —
किसी ज़रूरतमंद के हाथ में भी
मूंगफली–गजक रखकर मुस्कान बाँट दीजिए।
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