सर्दियों की रातों में एक अलग-सी खामोशी होती है। हवा ठंडी होती है, पर यादें हमेशा गर्म। गाँव के दिनों में, रातें सिर्फ ठंड से नहीं भरती थीं — वे किस्सों, हँसी और परिवार की नज़दीकियों से भी भर जाती थीं।
चूल्हे के पास रखी लकड़ियाँ जैसे-जैसे जलतीं, उनका चटकना किसी पुराने संगीत जैसा लगता। हम सब गोल-गोल बैठ जाते — कोई रोटी सेकता, कोई दादी से कहानी सुनता, और कोई बस आग को निहारता रह जाता। उस समय आग सिर्फ गर्मी नहीं देती थी — वह घर-भर को जोड़कर रखती थी।
आग के पास बैठना — एक छोटी-सी खुशी
हाथ फैलाकर आग सेंकना, और चेहरे पर पड़ती हल्की-सी गर्माहट…
लगता जैसे थकी हुई आत्मा भी आराम कर रही हो।
दादी अकसर कहती थीं —
“आग को देखो, यह सिर्फ लकड़ी नहीं जलाती, यह दिलों की दूरी भी पिघला देती है।”
और सच में —
उसी आग के आस-पास बैठकर शिकायतें छोटी हो जातीं, बातों में मिठास आ जाती और रात थोड़ी-सी लंबी, पर प्यारी लगने लगती।
आज शहर की सर्द रातें
अब सर्दियाँ वही हैं, पर रातें बदल गईं।
लकड़ियों का चूल्हा हीटर ने ले लिया,
परिवार की बातें मोबाइल ने।
कमरों में गर्मी तो है,
पर वो “सुकून” कहीं-ना-कहीं रास्ते में रह गया।
कभी-कभी मन करता है —
बस एक रात फिर से गाँव की तरह जिएँ,
आग के पास बैठें, चाय पिएँ और बिना जल्दबाज़ी के बातें करें।
सुकून का असली मतलब
शायद सुकून हमेशा बड़ी-बड़ी चीज़ों में नहीं मिलता।
कभी-कभी वह
एक चूल्हे की आँच,
एक धीमी मुस्कान,
या परिवार के साथ बिताए कुछ शांत पलों में छुपा होता है।

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