गर्मी के दिन थे। दिनभर सूरज की तपिश ने जैसे धरती को तपा दिया था। शरीर थक चुका था और मन बस यही चाहता था कि जल्दी से रात आए और थोड़ी राहत मिले। लेकिन गाँव की जिंदगी में आराम भी किस्मत वालों को ही मिलता है। उस दिन मेरी बारी थी खेत की रखवाली करने की।
रात धीरे-धीरे अपने कदम बढ़ा रही थी। आसमान में हल्के-हल्के बादल छाने लगे थे। हवा में एक अजीब सी नमी थी, जैसे बरसात कहीं पास ही खड़ी हो और बस इशारा मिलने का इंतजार कर रही हो। मैं अपने कंधे पर लाठी रखे खेत की तरफ बढ़ रहा था। दूर तक फैले खेत, बीच-बीच में झाड़ियों की हल्की सरसराहट, और ऊपर काले आसमान का फैलाव — सब कुछ एक अलग ही माहौल बना रहा था।
खेत के बीचों-बीच एक बड़ा सा पीपल का पेड़ था। दिन में यह बस एक साधारण पेड़ लगता था, जिसकी छांव में बैठकर लोग आराम करते थे। लेकिन रात होते ही वही पेड़ कुछ और ही रूप ले लेता था। बचपन से ही उसके बारे में तरह-तरह की कहानियाँ सुनी थीं। कोई कहता था कि वहाँ रात को कोई परछाईं दिखती है, कोई कहता था कि देर रात उस पेड़ के पास जाने वाला वापस नहीं आता। मैं हमेशा इन बातों को हंसी में टाल देता था, लेकिन उस रात, जब मैं अकेला था, तो वही कहानियाँ बार-बार याद आ रही थीं।
मैंने खेत के किनारे अपनी चारपाई डाली और बैठ गया। चारों तरफ सन्नाटा था। सिर्फ झींगुरों की आवाज़ और कभी-कभी दूर से किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज़ सुनाई देती थी। हवा चल रही थी, लेकिन उसमें भी एक अजीब सी बेचैनी थी। ऐसा लग रहा था जैसे हर झोंका कुछ कहने की कोशिश कर रहा हो।
अचानक आसमान में तेज चमक हुई। बिजली इतनी जोर से चमकी कि एक पल के लिए पूरा खेत उजाले में नहा गया। उसी पल मेरी नजर उस पीपल के पेड़ पर गई। ऐसा लगा जैसे उसकी शाखाएँ हिल नहीं रहीं, बल्कि किसी को बुला रही हों। दिल की धड़कन तेज हो गई। मैंने खुद को समझाया कि यह सिर्फ मेरा वहम है, लेकिन मन मानने को तैयार नहीं था।
कुछ देर बाद फिर से अंधेरा छा गया। अब सन्नाटा और भी गहरा हो गया था। मैंने अपनी लाठी को थोड़ा कसकर पकड़ लिया। अचानक मुझे ऐसा लगा जैसे कोई मेरे पीछे से गुजर गया हो। मैंने तुरंत पलटकर देखा, लेकिन वहाँ कोई नहीं था। हवा जरूर थोड़ी तेज हो गई थी, जिससे सूखी पत्तियाँ उड़ रही थीं। लेकिन उस पल मुझे यकीन हो गया था कि मैं अकेला नहीं हूँ।
समय जैसे रुक सा गया था। हर मिनट एक घंटे जैसा लग रहा था। मन में बार-बार ख्याल आ रहा था कि क्यों आया मैं यहाँ, क्यों नहीं किसी और को भेज दिया। लेकिन फिर जिम्मेदारी का ख्याल आता और मैं खुद को संभाल लेता। खेत की रखवाली करना जरूरी था।
तभी हल्की-हल्की बूंदें गिरने लगीं। बारिश की शुरुआत हो चुकी थी। मिट्टी की खुशबू हवा में घुल गई। लेकिन उस सुकून के साथ-साथ डर भी बढ़ गया। बारिश के साथ बिजली और तेज चमकने लगी। हर बार जब बिजली चमकती, तो पीपल का पेड़ और भी डरावना लगता। उसकी परछाईं जमीन पर फैलकर जैसे मेरी तरफ बढ़ रही थी।
एक बार तो मुझे साफ-साफ लगा कि उस पेड़ के नीचे कोई खड़ा है। मैंने ध्यान से देखा, लेकिन जैसे ही बिजली गई, वह आकृति भी गायब हो गई। अब मेरे हाथ-पैर सच में कांपने लगे थे। मैं उठकर थोड़ा आगे बढ़ा, लेकिन फिर रुक गया। हिम्मत और डर के बीच एक अजीब सी लड़ाई चल रही थी।
मैंने आँखें बंद कीं और गहरी सांस ली। खुद को समझाया कि यह सब मेरे मन का खेल है। लेकिन दिल मानने को तैयार नहीं था। फिर भी मैं वहीं खड़ा रहा। धीरे-धीरे बारिश तेज हो गई। अब मैं पूरी तरह भीग चुका था। कपड़े शरीर से चिपक गए थे, लेकिन मुझे अब इसकी परवाह नहीं थी।
उस रात मुझे पहली बार एहसास हुआ कि डर क्या होता है। वह डर जो सिर्फ बाहर नहीं, बल्कि अंदर भी होता है। लेकिन उसी डर के बीच एक अजीब सी ताकत भी महसूस हो रही थी। जैसे कोई कह रहा हो कि डटे रहो, सुबह होने वाली है।
और सच में, कुछ देर बाद आसमान थोड़ा साफ होने लगा। बारिश धीमी पड़ गई। दूर कहीं से मुर्गे की आवाज़ सुनाई दी। यह संकेत था कि सुबह होने वाली है। धीरे-धीरे उजाला फैलने लगा।
जैसे ही सूरज की पहली किरणें खेत पर पड़ीं, सब कुछ बदल गया। वही पीपल का पेड़ अब फिर से सामान्य लगने लगा। वही खेत, वही रास्ते — सब कुछ वैसा ही था, जैसा हर दिन होता था।
मैंने गहरी सांस ली और मुस्कुरा दिया। रात का डर अब कहीं खो चुका था। लेकिन वह रात मुझे बहुत कुछ सिखा गई थी।
जिंदगी में भी कई बार ऐसे ही पल आते हैं, जब चारों तरफ अंधेरा होता है, जब हर चीज डरावनी लगती है। लेकिन अगर हम उस वक्त डटे रहें, तो सुबह जरूर होती है।
उस रात मैंने सीखा कि असली हिम्मत डर के खत्म होने में नहीं, बल्कि डर के साथ खड़े रहने में है।

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