Wednesday, April 8, 2026

अप्रैल की वो रात… जब मौसम भी करवटें बदल रहा था

 अप्रैल का महीना चल रहा था, लेकिन उस दिन सुबह से ही मौसम का मिजाज कुछ बदला-बदला सा लग रहा था। आसमान में बादल और धूप के बीच जैसे कोई खेल चल रहा था। कभी हल्की धूप निकल आती, तो लगता दिन साफ रहेगा, और कभी अचानक बूंदाबांदी शुरू हो जाती, जैसे बादल अपनी मौजूदगी का एहसास दिला रहे हों। सूरज भी जैसे छुपन-छुपाई खेल रहा था, कभी दिखता, कभी बादलों के पीछे छिप जाता। 


दोपहर तक मौसम कुछ ठीक हो गया था। जब ऑफिस जाने का समय हुआ, तब न बारिश थी और न ही तेज हवा। ऐसा लगा जैसे दिन अब सामान्य ही बीतेगा। मैं रोज की तरह ऑफिस पहुँचा और अपने काम में लग गया। दिन भर काम की व्यस्तता में वक्त कैसे निकल गया, पता ही नहीं चला। लेकिन शाम होते-होते मौसम ने फिर से करवट ली।

बाहर अचानक जामाझम बारिश शुरू हो गई। खिड़की से बाहर देखा तो सड़कों पर पानी बह रहा था, लोग इधर-उधर भाग रहे थे, और हवा में एक अजीब सी ठंडक घुल गई थी। बारिश की वो आवाज, जो कभी सुकून देती है, उस दिन थोड़ी अलग लग रही थी—थोड़ी गहरी, थोड़ी सोच में डाल देने वाली।

रात को जब खाना खा लिया, तो थोड़ी देर के लिए बाहर टहलने का मन हुआ। लेकिन बाहर हल्की-हल्की बूंदाबांदी अभी भी जारी थी। ज्यादा दूर जाने का मन नहीं हुआ, इसलिए ऑफिस के नीचे बरामदे में ही कुछ देर टहलता रहा। ठंडी हवा के झोंके चेहरे को छूते हुए गुजर रहे थे। वो एहसास सुकून देने वाला था, लेकिन साथ ही एक अनजानी सी बेचैनी भी थी। कुछ देर बाद मैं वापस अपने काम में लग गया।

रात करीब 11 बजे जब छुट्टी का समय हुआ, तब तक बारिश थम चुकी थी। लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे यह ठहराव बस कुछ देर का ही है। ऑफिस से घर पहुँचा, तो हवा में वही नमी और ठंडक बनी हुई थी। मन में साफ एहसास हो रहा था कि बारिश फिर लौटेगी।

घर पहुँचकर मैंने कपड़े बदले और सीधे बिस्तर पर लेट गया। जैसे ही लेटा, ठंड का एहसास और ज्यादा होने लगा। तभी ध्यान आया कि पिछले हफ्ते जब घर जाने की तैयारी कर रहा था, तब मैंने कंबल पैक कर लिया था, लेकिन किसी कारण उसे साथ नहीं ले जा पाया था। उस वक्त थोड़ा अफसोस हुआ था, लेकिन उस रात लगा जैसे वही कंबल मेरे लिए किसी वरदान से कम नहीं है।

मैंने तुरंत कंबल निकाला और खुद को उसमें लपेट लिया। अप्रैल की 8 तारीख हो चुकी थी, लेकिन ठंड जैसे जाने का नाम ही नहीं ले रही थी। मौसम का यह बदलता रूप हैरान कर रहा था।

तभी अचानक रात के सन्नाटे में एक जोर की आवाज आई। दरवाजा अपने आप तेज हवा के कारण बंद हो गया था। मैं एक पल के लिए चौंक गया। बाहर झांककर देखा तो हवा काफी तेज चलने लगी थी। कुछ ही पलों में आसमान में बिजली चमकी। उस चमक ने एक पल के लिए पूरे माहौल को जैसे रोक सा दिया।

मैं जल्दी से वापस बिस्तर में आकर कंबल के अंदर दुबक गया। दिल में हल्का सा डर भी था, लेकिन उससे ज्यादा एक अजीब सा सुकून भी था। मैंने सोने का नाटक करना शुरू कर दिया, हालांकि नींद अभी दूर ही थी। आँखें बंद कर लीं, ताकि शायद कुछ देर में नींद आ जाए।

थोड़ी ही देर में बारिश की बूंदों की आवाज सुनाई देने लगी। पहले हल्की, फिर धीरे-धीरे तेज होती हुई। हवा भी अब जोर से चल रही थी। बाहर का माहौल पूरी तरह बदल चुका था। बारिश, हवा और कभी-कभी चमकती बिजली — सब मिलकर एक अलग ही दुनिया बना रहे थे।

कंबल के अंदर लेटे-लेटे मैं उस आवाज को महसूस कर रहा था। कभी लगता जैसे यह सब डरावना है, तो कभी लगता यही तो वो पल हैं, जिनमें जिंदगी का असली सुकून छुपा है। पता ही नहीं चला कब इन सब आवाजों के बीच मुझे नींद आ गई।

सुबह करीब 4 बजे मेरी आंख खुली। बाहर अभी भी हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। माहौल शांत था, लेकिन बूंदों की आवाज अभी भी सुनाई दे रही थी। मैंने एक नजर बाहर डाली और फिर से कंबल ओढ़कर सो गया।

फिर सुबह 6 बजे दोबारा आंख खुली। इस बार बारिश रुक चुकी थी। आसमान थोड़ा साफ लग रहा था। लेकिन नींद अभी भी पूरी नहीं हुई थी, इसलिए फिर से सो गया।

जब अगली बार आंख खुली, तो करीब 8 बज चुके थे। इस बार मैंने बिस्तर छोड़ने का फैसला किया। उठकर तैयार हुआ और नाश्ता करने चला गया।

अब धूप निकल चुकी थी, लेकिन बादल अभी भी पूरी तरह गए नहीं थे। वे बीच-बीच में सूरज को ढक लेते, जैसे फिर से वही आंख-मिचौली शुरू हो गई हो। मौसम अब भी पूरी तरह साफ नहीं था, लेकिन उसमें एक ताजगी जरूर थी।

नाश्ता करके जब वापस लौटा, तो हवा ने अचानक अपना रूप बदल लिया। अब वह एक तेज आंधी में बदल चुकी थी। पेड़ झुकने लगे थे, और आसमान फिर से गहराने लगा था।

मैंने बाहर जाने का विचार छोड़ दिया और अपने कमरे में ही दुबक गया। ऐसे मौसम में बाहर की हलचल देखने से ज्यादा, अंदर का सुकून अच्छा लगता है। ठंडी हवा, हल्की थकान और रात की अधूरी नींद — सब मिलकर एक ही बात कह रहे थे, “अब थोड़ा आराम कर लो।”

मेरे पास कंबल भी था, बिस्तर भी और नींद भी। फिर और क्या चाहिए था। मैंने बिना ज्यादा सोचे कंबल उठाया, बिस्तर पर लेट गया और खुद को उसमें समेट लिया।

बाहर मौसम फिर अपने रंग बदल रहा था, लेकिन इस बार मैं उससे दूर, अपने छोटे से सुकून भरे कोने में था। कुछ ही पलों में आंखें बंद हो गईं और मैं फिर से नींद की दुनिया में खो गया।

शायद जिंदगी भी कुछ ऐसी ही होती है…
कभी धूप, कभी बारिश, कभी ठंडी हवा, कभी आंधी।
लेकिन इन सबके बीच अगर हमें एक छोटा सा सुकून मिल जाए —
तो वही सबसे बड़ी राहत बन जाता है।

No comments:

Post a Comment

उम्मीद का दीया

  एक घर में पाँच दीये जल रहे थे।  उनकी रोशनी से पूरा घर जगमगा रहा था। हर दीया अपने भीतर एक अलग संदेश और एक अलग भावना लिए हुए था। पहला दीया उ...