मौसम बदलता था, मन भी बदल जाता था
सर्दियों के आख़िरी दिन…
जब धूप थोड़ी लंबी होने लगती थी और ठंडी हवाओं में हल्की-सी नरमी घुल जाती थी, तब समझ आ जाता था—
अब मौसम बदलने वाला है।
गाँव में मौसम का बदलना सिर्फ तापमान का बदलना नहीं था,
वो जीवन की रफ्तार का बदलना था।
रजाइयों से निकलकर खुले आँगन तक की यात्रा थी।
सर्द सुबहें और धुंध की चादर
सर्दियों की सुबहें धुंध से ढकी होती थीं। खेतों में सरसों पीली चादर ओढ़े खड़ी रहती,
और हम ऊनी स्वेटर में सिकुड़े-सिकुड़े स्कूल जाते।
धूप का इंतज़ार पूरे दिन रहता। जैसे ही धूप निकलती, आँगन में चारपाई डाल दी जाती।
दादी वहीं बैठकर मूंगफली तोड़तीं, माँ धूप में पापड़ सुखातीं।
लेकिन धीरे-धीरे वही धूप तेज़ होने लगती। स्वेटर हल्के पड़ने लगते।
और एक दिन ऐसा आता जब बिना स्वेटर के बाहर निकलना अच्छा लगने लगता।
बसंत की आहट
फरवरी-मार्च का महीना जैसे रंगों का संदेश लेकर आता था।
खेतों में सरसों खिलती, पेड़ों पर नई कोपलें झाँकतीं।
हवा में ठंडक तो होती, लेकिन चुभन नहीं रहती।
पतंगें आसमान में फिर से दिखने लगतीं।
बच्चे छतों पर चढ़ जाते— “वो काटा… वो काटा!”
बसंत जैसे यह याद दिलाता था कि ठंड हमेशा के लिए नहीं रहती।
रजाई से आँगन तक
सर्दियों में हम सब एक ही कमरे में बैठते थे। रात को अंगीठी जलती थी,
रजाई में दुबककर कहानियाँ सुनते थे।
लेकिन जैसे ही गर्मी की आहट होती, वही परिवार आँगन में बैठने लगता।
शाम को ठंडी हवा चलती, और पेड़ों की छाँव में बैठकर बातें होतीं।
गाँव में मौसम बदलने का मतलब था— जीवन फिर से बाहर आ रहा है।
गर्मी की तैयारी
जैसे-जैसे अप्रैल नज़दीक आता, घर में आम के अचार की खुशबू फैल जाती।
माँ कच्चे आम काटतीं, मसालों की खुशबू पूरे घर में घूमती।
रजाइयाँ धुलकर संदूक में रख दी जातीं। गर्म कपड़े समेट दिए जाते।
और हम बच्चे खुशी से कहते— “अब छुट्टियाँ आने वाली हैं!”
गर्मी की पहली दोपहर
पहली गर्म दोपहर का एहसास अलग ही होता था। धूप तेज़ हो जाती,
लेकिन मन में उत्साह भी बढ़ जाता।
स्कूल की छुट्टियाँ शुरू होतीं। आम के पेड़ों के नीचे बैठना,
दोपहर में ठंडा पानी पीना, और शाम को खेतों की ओर निकल जाना।
रात को छत पर सोना शुरू हो जाता। तारों भरा आसमान और हल्की हवा—
जैसे प्रकृति खुद कह रही हो, “एक नया मौसम शुरू हो गया है।”
बदलते मौसम की सीख
आज शहरों में मौसम का बदलाव उतना महसूस नहीं होता।
ए.सी. और हीटर के बीच अंतर कम हो गया है।
लेकिन गाँव में मौसम का बदलना जीवन का हिस्सा था।
उसने हमें सिखाया—
हर कठिन समय के बाद राहत आती है।
ठंड के बाद गर्मी, और अंधेरे के बाद उजाला तय है।
बदलाव जीवन का नियम है।
जैसे सर्दी से गर्मी का मौसम आता है,
वैसे ही जीवन में भी कठिनाइयाँ बदलती हैं।
यादों की गर्माहट
आज जब हल्की-सी धूप चेहरे पर पड़ती है,
तो बचपन की वही बदलती ऋतु याद आ जाती है।
रजाई की गरमाहट से लेकर आम के पेड़ों की छाँव तक का सफर—
वो सिर्फ मौसम नहीं था, वो जीवन का सबसे सुंदर अध्याय था।
शायद मौसम आज भी बदलते हैं, लेकिन उन्हें महसूस करने का समय कम हो गया है।
फिर भी… जब भी सर्दी से गर्मी का मौसम आता है,
दिल के किसी कोने में बचपन की वही यादें फिर से खिल उठती हैं।

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