जब हवा में रोटी की महक घुल जाती थी
मार्च का महीना जैसे ही आता था, गाँव की हवा में एक अलग-सी खुशबू तैरने लगती थी।
वो खुशबू थी पकते हुए गेहूँ की। ऐसी महक, जो पेट से पहले दिल को भर देती थी।
सुबह हल्की ठंडक रहती, दोपहर में हल्की-सी गर्मी महसूस होती, और शाम को फिर से ठंडी हवा चलने लगती।
मार्च सिर्फ एक महीना नहीं था, वो मौसम का संगम था— सर्दी की विदाई और गर्मी की दस्तक।
खेतों का सुनहरा रूप
जब गेहूँ की बालियाँ पककर झुकने लगती थीं, तो पूरा खेत सोने-सा चमकने लगता।
हवा चलती तो सुनहरी लहरें उठतीं, जैसे धरती खुद मुस्कुरा रही हो।
हम बच्चे खेतों की मेड़ों पर दौड़ते, और उन बालियों को हाथ से छूते हुए आगे बढ़ जाते।
दूर कहीं किसान खड़ा फसल को निहारता, उसकी आँखों में संतोष झलकता था।
वो सिर्फ अनाज नहीं था, पूरे साल की मेहनत का फल था।
कभी गर्मी, कभी ठंड
मार्च की सुबहें अभी भी हल्की सर्द होती थीं।
स्वेटर पूरी तरह उतरा नहीं था,
लेकिन दोपहर में पहनना भारी लगता।
दोपहर की धूप में पसीना भी आ जाता,
और शाम को वही ठंडी हवा फिर से गालों को छू जाती।
ये बदलता हुआ एहसास हमें सिखाता था—
जिंदगी भी ऐसी ही है।
कभी सर्द, कभी गर्म…
लेकिन हमेशा चलती रहती है।
खेतों की महक और बचपन
माँ कहती थीं—
“देखो, अब गेहूँ पक गया है, कटाई का समय आ गया।”
कटाई के दिनों में गाँव का माहौल अलग ही होता था।
हर घर में व्यस्तता, हर खेत में हलचल।
हम बच्चे कभी गेहूँ की बालियाँ तोड़ लेते,
उन्हें हाथों से मसलकर दाने निकालते
और कच्चा ही चख लेते।
उसमें मिट्टी की खुशबू मिलती थी,
और मेहनत का स्वाद भी।
शाम की सैर
मार्च की शामें खास होती थीं।
ना ज्यादा ठंड, ना ज्यादा गर्मी।
खेतों की पगडंडी पर चलते हुए
डूबते सूरज को देखना—
जैसे दिन खुद कह रहा हो,
“अब फसल तैयार है।”
हवा में पकते अनाज की महक,
दूर कहीं से आती बैलों की घंटियों की आवाज़—
सब मिलकर एक ऐसा दृश्य बनाते,
जो आज भी आँखें बंद करते ही सामने आ जाता है।
गाँव की सादगी
उस समय जीवन की रफ्तार धीमी थी।
हर चीज़ में एक ठहराव था।
कटाई के बाद घरों में नई फसल का अनाज आता,
और माँ पहली रोटी बनाते समय
आग के सामने सिर झुका देतीं।
वो सिर्फ रोटी नहीं थी,
वो आभार था—
धरती का, मौसम का, और मेहनत का।
बदलते समय की कसक
आज भी मार्च आता है,
गेहूँ पकता है,
हवा में खुशबू घुलती है।
लेकिन अब खेत कम दिखते हैं,
और वो महक शहर की हवा में खो जाती है।
ए.सी. कमरों में बैठकर
हम मौसम के बदलाव को उतना महसूस नहीं कर पाते।
शायद समय बदल गया है,
लेकिन यादें नहीं बदलीं।
खुशबू जो आज भी दिल में बसती है
हर साल जब मार्च की हल्की-सी हवा चलती है,
तो दिल उसी पुराने खेत की ओर भागता है।
जहाँ गेहूँ की बालियाँ झुककर मुस्कुराती थीं,
जहाँ हवा में रोटी की खुशबू पहले ही तैर जाती थी।
वो दिन शायद लौटकर नहीं आएंगे,
लेकिन उनकी महक आज भी दिल में बसी है।
मार्च आज भी आता है,
मौसम आज भी बदलता है—
लेकिन बचपन की वो सुनहरी फसल
अब सिर्फ यादों में लहलहाती है।

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