Tuesday, February 24, 2026

बचपन के दिन – “वो गली, वो धूल… और हम”


यादों का दरवाज़ा

जब भी जिंदगी की भागदौड़ से थक जाता हूँ, 



तो मन अपने आप उस पुराने घर की ओर लौट जाता है—
मिट्टी की दीवारें, खुला आँगन, और वो धूल भरी गली।

वो गली जहाँ हम नंगे पाँव दौड़ते थे,
जहाँ गिरने पर घुटने छिलते थे,
लेकिन आँसू ज़्यादा देर तक ठहरते नहीं थे।

बचपन सच में एक खुली किताब था—
जिसमें हर दिन एक नई कहानी लिखी जाती थी।


 सुबह की शुरुआत

गाँव की सुबह किसी अलार्म से नहीं,
मुर्गे की बाँग से होती थी।

सूरज की पहली किरण जैसे ही खिड़की से अंदर आती,
माँ की आवाज़ कानों में पड़ती—
“उठ जाओ, स्कूल नहीं जाना क्या?”

नींद भरी आँखों से उठना भारी लगता,
लेकिन जैसे ही दोस्तों की आवाज़ बाहर से आती,
सारी आलस हवा हो जाती।

जल्दी-जल्दी नहाकर, तेल लगाए बालों के साथ,
कंधे पर बस्ता टांगे हम स्कूल की राह पकड़ लेते।


 स्कूल की शरारतें

स्कूल सिर्फ पढ़ाई की जगह नहीं था,
वो हमारी दूसरी दुनिया थी।

कभी पीछे बैठकर चुपके से बातें करना,
कभी टीचर की नकल उतारना,
कभी होमवर्क भूल जाने पर बहाना बनाना—

हर दिन में कोई न कोई शरारत जरूर होती थी।

लंच ब्रेक का इंतजार सबसे ज्यादा रहता।
टिफिन खोलते ही दोस्त घेर लेते—
“थोड़ा मुझे भी देना!”

कभी अचार की खुशबू,
कभी पराठों की महक…
सब मिल-बाँटकर खाते थे।


 दोपहर का खेल

स्कूल से लौटते ही बस्ता एक कोने में फेंक देते।
ना थकान याद रहती, ना गर्मी।

गिल्ली-डंडा, कबड्डी, कंचे,
और कभी-कभी पेड़ पर चढ़ने की प्रतियोगिता।

हारने पर थोड़ी-सी बहस होती,
लेकिन दोस्ती कभी नहीं टूटती।

धूप में पसीना बहता,
लेकिन चेहरे पर मुस्कान रहती।

वो खेल हमें सिर्फ मनोरंजन नहीं देते थे,
वो हमें टीमवर्क, हिम्मत और हार-जीत को स्वीकार करना सिखाते थे।


 बारिश और कागज़ की नाव

बरसात का मौसम आते ही हमारी खुशी दोगुनी हो जाती।

पहली बूंद गिरते ही हम घर से बाहर भागते।
कागज़ की नाव बनाकर पानी में बहाते,
और उसे दूर तक जाते हुए देखते रहते।

कीचड़ में फिसलना,
पानी में छींटे उड़ाना—
ये सब हमारे लिए किसी त्योहार से कम नहीं था।

माँ डाँटती जरूर थीं—
“बीमार पड़ जाओगे!”
लेकिन उनकी आँखों में भी हमारी खुशी देखकर सुकून झलकता था।


 रात की कहानियाँ

शाम ढलते ही घर का आँगन ठंडा हो जाता।
चारपाई बिछती, और सब एक साथ बैठते।

दादी की कहानियाँ शुरू होतीं—
राजा-रानी, परियाँ, और बहादुर योद्धा।

हम आँखें बड़ी-बड़ी करके सुनते रहते।
कभी डर जाते,
कभी हँसते-हँसते लोटपोट हो जाते।

रात को आसमान में तारे गिनते-गिनते
कब नींद आ जाती, पता ही नहीं चलता।


 छोटी खुशियों की बड़ी कीमत

उस समय खुशी की परिभाषा बहुत छोटी थी—
मेले में मिला गुब्बारा,
दो रुपये की टॉफी,
या पिताजी से मिली एक नई पेंसिल।

आज सब कुछ है—
लेकिन वो इंतजार वाली खुशी नहीं है।

बचपन में चीजें कम थीं,
लेकिन खुशी ज्यादा थी।


 परिवार – हमारी असली दुनिया

सबसे बड़ी बात थी परिवार का साथ।

पापा की सख्ती में छुपा प्यार,
माँ की डाँट में छुपी चिंता,
दादी की कहानियों में छुपी सीख—

ये सब हमारे व्यक्तित्व की नींव बन गए।

आज समझ आता है कि
वो सादगी ही हमारी सबसे बड़ी दौलत थी।


 समय का पहिया

समय धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया।
हम बड़े हो गए।

जिम्मेदारियाँ बढ़ीं,
सपने बदल गए,
दोस्त दूर हो गए।

वो गली आज भी होगी,
लेकिन उसमें दौड़ने वाले कदम बदल गए होंगे।


बचपन कहीं गया नहीं

बचपन शायद लौटकर नहीं आता,
लेकिन उसकी यादें दिल में हमेशा रहती हैं।

जब कभी थकान घेर लेती है,
या जिंदगी भारी लगती है,
तो मैं आँखें बंद कर लेता हूँ—

और खुद को फिर उसी धूल भरी गली में पाता हूँ,
जहाँ मैं नंगे पाँव दौड़ रहा हूँ,
बिना किसी डर, बिना किसी चिंता के।

शायद जिंदगी का असली मतलब भी वही है—
अपने अंदर के उस बच्चे को जिंदा रखना।

क्योंकि अगर दिल में बचपन बचा है,
तो जिंदगी आज भी उतनी ही खूबसूरत है।

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