जब जिंदगी आसान थी
बचपन…
सिर्फ एक शब्द नहीं, एक एहसास है।
वो समय जब जेब खाली होती थी,
लेकिन दिल भरा हुआ।
ना भविष्य की चिंता,
ना अतीत का पछतावा।
बस आज था… और वही काफी था।
सुबह की पहली किरण के साथ दिन शुरू होता और शाम ढलते-ढलते थककर मीठी नींद आ जाती।
न मोबाइल, न सोशल मीडिया—
दोस्त ही हमारी दुनिया थे।
खेल ही जिंदगी थे
गली में गिल्ली-डंडा,
मैदान में कबड्डी,
बरसात में कागज़ की नाव,
और पतंग उड़ाने की होड़।
हारने पर थोड़ी-सी नाराज़गी,
और पाँच मिनट बाद फिर वही दोस्ती।
माँ की आवाज़ गली के कोने तक सुनाई देती—
“घर आ जाओ, खाना तैयार है!”
लेकिन खेल इतना जरूरी होता कि
“बस पाँच मिनट और…” कहते-कहते आधा घंटा निकल जाता।
बारिश और शरारतें
जैसे ही बारिश शुरू होती,
हम घर से बाहर भाग जाते।
कभी कीचड़ में फिसलते,
कभी पेड़ों के नीचे भीगते।
कागज़ की नाव बनाकर नाली में बहाते,
और उसे दूर तक जाते देख खुश हो जाते।
माँ डाँटती जरूर थीं,
लेकिन तौलिये से पोंछते वक्त उनके चेहरे पर मुस्कान भी होती थी।
छोटी-छोटी खुशियाँ
स्कूल से लौटते समय
दो रुपये की टॉफी लेना भी किसी खजाने से कम नहीं लगता था।
नए जूते, नई किताबें,
या मेले में मिला कोई खिलौना—
हमारी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता।
आज सब कुछ आसानी से मिल जाता है,
लेकिन वो इंतजार वाली खुशी अब नहीं मिलती।
परिवार का साया
दादी की कहानियाँ,
पापा की सख्ती में छुपा प्यार,
माँ के हाथ का खाना—
यही तो असली अमीरी थी।
रात को सब साथ बैठकर खाना खाते,
दिनभर की बातें होतीं,
और हँसी घर में गूंजती रहती।
आज समय है, साधन हैं,
लेकिन वो साथ बैठने का समय कम हो गया है।
वो दिन हमें क्या दे गए?
बचपन ने हमें सिखाया—
-
सादगी में भी खुशी मिलती है।
-
दोस्ती का मतलब बिना शर्त साथ देना है।
-
गिरकर उठना ही जिंदगी है।
बचपन चला गया,
लेकिन उसकी यादें आज भी दिल में जिंदा हैं।
दिल के किसी कोने में आज भी बचपन है
समय बदल गया है।
हम बड़े हो गए हैं।
जिम्मेदारियाँ बढ़ गई हैं,
सपने बदल गए हैं।
लेकिन जब कभी कोई पुराना गाना सुनते हैं,
या बचपन की कोई तस्वीर हाथ लगती है—
तो दिल फिर उसी गली में दौड़ने लगता है।
शायद बचपन कभी लौटकर नहीं आता,
लेकिन उसकी मासूमियत अगर हम अपने अंदर बचाकर रखें,
तो जिंदगी आज भी उतनी ही खूबसूरत हो सकती है।

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