Thursday, February 5, 2026

गाँव की शादी — जहाँ खुशियाँ उधार नहीं होती थीं

 1990 के दशक की गाँव की शादी

आज की तरह एक इवेंट नहीं होती थी, 
वो पूरे गाँव का त्यौहार होती थी। 


शादी का रिश्ता तय होते ही
सबसे पहले बात दहेज या होटल की नहीं,
बल्कि तारीख, मौसम और फसल की होती थी।
क्योंकि शादी खेतों की छुट्टी देखकर होती थी,
ना कि बैंक बैलेंस देखकर।

घर के आँगन में चार बाँस गाड़कर मंडप बनता था,
ऊपर से आम के पत्ते, और नीचे मिट्टी की सौंधी खुशबू।
किसी डिज़ाइनर की ज़रूरत नहीं थी, क्योंकि हर हाथ में अपनापन था।

औरतें कई दिन पहले से पीढ़ी पर बैठकर गीत गुनगुनाने लगती थीं—
सोहर, कजरी, विवाह गीत, जिनमें हँसी भी होती थी और विदाई की हल्की नमी भी।

हलवाई बाहर से नहीं बुलाया जाता था, पूरा गाँव ही हलवाई होता था।
कोई सब्ज़ी काट रहा है, कोई चूल्हा फूँक रहा है, तो कोई पत्तल सजा रहा है।
रसोई में मसालों से ज़्यादा बातों की खुशबू होती थी।

दूल्हा घोड़ी पर नहीं, अक्सर ट्रैक्टर या सजी हुई बैलगाड़ी पर आता था।
डीजे नहीं, ढोलक, नगाड़ा और शहनाई होती थी—
जिनकी आवाज़ सीधे दिल तक जाती थी, कानों को नहीं चीरती थी।

बारात में न कोई VIP होता था, न कोई आम।
सब एक पंक्ति में खाते थे, एक जैसे पत्तल में, और एक जैसे स्वाद से तृप्त होते थे।

दुल्हन की विदाई सबसे शांत और सबसे भारी पल होता था।
न कैमरा चमकता था, न लाइटें होती थीं—
बस माँ की आँखें बोलती थीं, और बिटिया की चुप्पी रोती थी।

उस समय शादी सोशल मीडिया के लिए नहीं,
रिश्तों के लिए होती थी। न फोटोज़ पर फ़िल्टर था,
न रिश्तों में दिखावा। आज की शादियाँ

रोशनी से चमकती हैं, पर वो अँधेरा छुपा लेती हैं।
तब की शादियाँ साधारण थीं, पर दिलों को उजाला दे जाती थीं।

1990 के गाँव की शादी मुझे आज भी याद है—
क्योंकि वहाँ पैसा कम था, पर रिश्ते पूरे थे।

और शायद इसी लिए आज भी वो शादियाँ
मेरी ज़िंदगी की सबसे अमीर यादें हैं।

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