मेरी ज़िंदगी की सबसे सच्ची तस्वीर अगर कहीं मिलती है, तो वो इन खेतों में मिलती है।
जहाँ सुबह सूरज निकलने से पहले ही धरती जाग जाती है,
और पंछियों की चहचहाहट नींद से पहले दिल को छू जाती है।
बचपन में खेत सिर्फ़ ज़मीन का टुकड़ा नहीं थे,
वो हमारा खेल का मैदान थे,
हमारी पाठशाला थे,
और हमारे सपनों की पहली सीढ़ी भी।
नंगे पाँव मिट्टी पर चलना,
ओस से भीगे पत्तों को छूना,
हल की आवाज़ में पिता की मेहनत सुनना—
आज भी आँखें बंद करूँ तो सब साफ़ दिखाई देता है।
गर्मी की दोपहर में
पेड़ की छाँव तले बैठकर
माँ के हाथ का सूखा रोटी–प्याज़ खाना,
और पसीने में भी सुकून ढूँढ लेना—
शायद यही असली अमीरी थी,
जिसकी कीमत आज समझ आती है।
खेतों ने मुझे सिखाया
कि बीज छोटा होता है,
पर भरोसा बड़ा होना चाहिए।
मेहनत आज करो,
फल कल मिलेगा—
बस धैर्य रखना ज़रूरी है।
जब फसल लहलहाती थी,
तो सिर्फ़ खेत नहीं,
हमारा दिल भी हरा हो जाता था।
और जब बारिश साथ न देती,
तो खेत के साथ-साथ
घर की आँखें भी भीग जाती थीं।
शहर की ज़िंदगी ने
मुझे छत तो दे दी,
पर आसमान छीन लिया।
यहाँ सब कुछ है—
पर वो सुकून नहीं,
जो शाम को खेत की मेड़ पर बैठकर
डूबते सूरज को देखने में मिलता था।
आज भी जब ज़िंदगी थका देती है,
तो मन उन्हीं खेतों में भाग जाता है—
जहाँ कोई दिखावा नहीं,
कोई बनावट नहीं,
सिर्फ़ मैं, मिट्टी
और ईमानदार मेहनत।
खेतों ने मुझे गिरना भी सिखाया,
और फिर उठकर खड़ा होना भी।
उन्होंने बताया कि
हर सूखा स्थायी नहीं होता,
हर रात के बाद
सुबह ज़रूर आती है।
मेरी ज़िंदगी की जड़ें
आज भी वहीं दबी हैं—
उसी मिट्टी में,
जहाँ मैंने चलना सीखा,
सपना देखना सीखा
और इंसान बनना सीखा।
अगर कभी खुद को खोया हुआ पाऊँ,
तो मुझे ढूँढना मत शहर की भीड़ में—
मैं मिलूँगा
अपने खेतों के बीच,
मिट्टी से सना हुआ,
पर दिल से पूरा।

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