Friday, February 6, 2026

पटरियों पर चलती यादें

 मेरी ज़िंदगी की कई यात्राएँ सड़कों से नहीं, 


रेल की पटरियों से होकर गुज़री हैं।
हर स्टेशन, हर सीटी, हर डिब्बा
मुझे मेरे गाँव सोंटा से जोड़ता रहा—
जहाँ से सपने निकलते हैं
और यादें लौटकर आती हैं।

 गाँव सोंटा: जहाँ से सफ़र शुरू होता है

गाँव सोंटा…
एक ऐसा नाम जो सुनते ही
मिट्टी की खुशबू,
खेतों की हरियाली
और सादगी से भरा जीवन आँखों के सामने आ जाता है।

सुबह-सुबह जब गाँव से निकलने की तैयारी होती थी,
माँ का हाथ सिर पर होता था,
और आँखों में चिंता भी
और दुआ भी।
पिता ज़्यादा कुछ कहते नहीं थे,
बस इतना—
“ध्यान रखना।”

गाँव से स्टेशन तक का रास्ता
हमेशा मन को भारी कर देता था।
पीछे छूटते खेत,
पीपल का पेड़,
और वो रास्ता
जिस पर बचपन नंगे पाँव चला था।

🚉 अंबाला कैंट: पहली बड़ी हलचल

जब ट्रेन अंबाला कैंट पहुँचती थी,
तो लगता था जैसे
एकदम दूसरी दुनिया में आ गए हों।

यहाँ हर तरफ़
फौजी वर्दियाँ,
तेज़ क़दमों की आवाज़,
और लगातार आती-जाती ट्रेनें—
सब कुछ व्यवस्थित,
सब कुछ भागता हुआ।

अंबाला कैंट स्टेशन
मेरे लिए सिर्फ़ एक जंक्शन नहीं था,
वो गाँव और शहर के बीच की दीवार था।
इधर गाँव की सादगी,
उधर आगे बढ़ती ज़िंदगी।

स्टेशन पर चाय की केतली से उठती भाप,
समोसे की खुशबू
और अनाउंसमेंट की आवाज़—
आज भी कानों में गूँजती है।

 अंबाला से अंबाला सिटी: सफ़र का दूसरा रंग

अंबाला कैंट से
जब ट्रेन अंबाला सिटी की ओर बढ़ती,
तो माहौल थोड़ा बदल जाता।

यहाँ
व्यापार की चर्चा होती,
यात्रियों की संख्या बढ़ जाती,
और बातचीत का शोर भी।

खिड़की से बाहर
तेज़ी से भागते घर,
छोटे-छोटे बाज़ार,
और बदलता पंजाब-हरियाणा का दृश्य—
मन को एहसास दिलाता
कि ज़िंदगी सिर्फ़ गाँव तक सीमित नहीं।

इसी हिस्से में
अक्सर मन सबसे ज़्यादा सोचता था—
कि आगे क्या है?
कहाँ तक जाना है?
और लौटना कब है?

 रेल का डिब्बा: ज़िंदगी का छोटा संसार

रेल का एक डिब्बा
अपने आप में पूरी दुनिया होता है।

कोई पहली बार सफ़र कर रहा होता है,
कोई रोज़ का मुसाफ़िर,
तो कोई
दिल में बड़ा सपना लेकर।

कोई अपना दुख बाँट देता है,
कोई अपनी कहानी।
और हम,
चुपचाप सब सुनते हुए
अपने बारे में सोचते रहते हैं।

रेल के सफ़र में
अजनबी लोग भी
कुछ समय के लिए
अपने से लगने लगते हैं।

 अंबाला से डेरा ब्यास: सुकून की ओर

जैसे-जैसे ट्रेन
डेरा ब्यास की ओर बढ़ती है,
मन का शोर
धीरे-धीरे कम होने लगता है।

खिड़की से दिखते खेत,
नदियाँ,
और दूर-दूर तक फैली शांति—
दिल को हल्का कर देती है।

डेरा ब्यास
मेरे लिए सिर्फ़ एक जगह नहीं,
बल्कि
मन की सफ़ाई का ठिकाना है।

यहाँ पहुँचते ही
ऐसा लगता है
जैसे
भीतर की सारी थकान
रेल की पटरियों पर उतर गई हो।

 डेरा ब्यास: जहाँ सफ़र ठहर जाता है

डेरा ब्यास की हवा
कुछ अलग ही होती है।
यहाँ शब्द कम पड़ जाते हैं,
और सुकून ज़्यादा बोलता है।

यहाँ आकर
मन को एहसास होता है
कि ज़िंदगी सिर्फ़ दौड़ नहीं,
ठहराव भी है।

गाँव सोंटा से शुरू हुआ सफ़र
यहाँ आकर
मन को दिशा दे देता है।

 वापसी की सोच

हर यात्रा की तरह
इसकी भी वापसी होती है।
पर वापसी में
इंसान वही नहीं रहता
जो गया था।

डेरा ब्यास से लौटते समय
दिल में
थोड़ा सुकून,
थोड़ी शांति
और
थोड़ा-सा खुद से जुड़ाव होता है।

 मेरी ज़िंदगी और रेल

मेरी ज़िंदगी की कहानी
इन्हीं पटरियों पर लिखी गई है—
सोंटा की मिट्टी से लेकर
डेरा ब्यास की शांति तक।

रेल ने मुझे
लोगों को समझना सिखाया,
खुद को जानना सिखाया
और
हर सफ़र में
थोड़ा बेहतर इंसान बनना सिखाया।

आज भी
जब ट्रेन की सीटी सुनता हूँ,
तो मन अपने आप कह उठता है—
“चलो,
फिर से
ज़िंदगी की एक और यात्रा शुरू करें।”

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