(एक भावनात्मक ग्रामीण ब्लॉग)
सर्दियों की वो सुबह आज भी यादों में ताज़ा है, जब खेतों में सरसों पूरी तरह पक चुकी थी और अब बस उसकी कटाई बाकी थी। पीली-पीली सरसों हवा में झूमती, मानो हमसे कह रही हो—“अब मुझे घर ले चलो।” उस दिन मेरे पिता जी, चाचा जी, दो चचेरे भाई और मैं, सबने मिलकर सरसों की कटाई की जिम्मेदारी संभाली। गाँव की मिट्टी में पला-बढ़ा इंसान जानता है कि फसल काटते समय खेत सिर्फ ज़मीन नहीं होता, एक भाव होता है… अपनापन, मेहनत और उम्मीद का।
धुंध और ठंडी हवा का स्वागत
सुबह की धुंध इतनी गहरी थी कि सामने खड़ा इंसान भी धुंधला दिख रहा था। हम अपने घरों से दरांती उठाकर निकले ही थे कि गीली घास पर पड़ी ओस हमारे कपड़ों को भिगो चुकी थी। ठंड की चुभन और तेज़ होती जाती थी, लेकिन मन में एक ही उत्साह था—आज सरसों काटनी है।
रास्ता भी धुंध की वजह से साफ़ नजर नहीं आ रहा था। सरसों पककर नीचे झुक गई थी, इसलिए खेतों के बीच से जाने वाले रास्ते भी गायब से लग रहे थे। लेकिन गाँव के लोग दिल से रास्ता ढूंढ़ लेते हैं—हम भी ढूंढ़ ही लिया।
काम की शुरुआत
किसान की जिंदगी में काम से पहले कुछ पल का विश्राम ही सबसे बड़ी पूँजी होता है। हम सबने खेत पहुँचकर पहली धूप की तलाश में कुछ देर आराम किया। थोड़ी ही देर में सूरज बादलों के पीछे से झाँकने लगा, और ठंड जैसे हार मानने लगी। अब काम करने में मज़ा आने लगा।
चाय की चुस्कियों में मिली गर्माहट
करीब 10 बजे सबने एक साथ चाय पी। हाथों में गर्म चाय का कुल्हड़ और ठंडी हवा—यह अनुभव गाँव की मिट्टी का अपना ही सुख है। चाय पीते ही जैसे शरीर में नई ऊर्जा भर गई हो। फिर से हम सब अपने-अपने हिस्से की सरसों काटने में लग गए।
चाचा जी बीच-बीच में खेत से बाहर जाकर बीड़ी पीते, और हम पानी पीकर थोड़ी देर आराम कर लेते। लेकिन कटाई का जोश उतना ही बना रहा।
आधी फसल पूरी — आधी का इंतज़ार
दोपहर तक लगभग आधा एकड़ सरसों कट चुकी थी। आधा एकड़ अभी बाकी था। धूप थोड़ी तेज़ हो चुकी थी, इसलिए हमने खाना खाया, थोड़ी देर पेड़ की छाँव में लेटे, और फिर काम में जुट गए। खेतों की खामोशी के बीच सिर्फ दरांती की “छप-छप” की आवाज़, और कभी-कभार चाचा जी की बीड़ी सुलगाने की आवाज़ आती थी।
शाम की आहट — हौंसलों की रोशनी
धीरे-धीरे सूरज ढलने लगा। खेत का रंग भी पीले से थोड़ा सुनहरा और नरम हो गया। शाम की चाय पीकर हम सबने आखिरी बार हिम्मत जुटाई—अब सिर्फ थोड़ी ही सरसों बाकी थी। सबके चेहरों पर थकान भी थी और संतोष भी।
दरांती के हर वार के साथ ऐसा लगता था जैसे हम बस अपनी मेहनत की कमाई घर ले जाने से बस एक कदम दूर हैं। और आखिरकार… शाम तक सारी सरसों कट चुकी थी। खेत अब साफ और शांत दिख रहा था, जैसे दिनभर के शोर के बाद खुद भी आराम कर रहा हो।
घर वापसी का सुकून
थके हुए कदमों से, लेकिन संतुष्टि से भरे दिलों के साथ हम सब घर लौट चले। मिट्टी की खुशबू, सरसों के फूलों की महक, धुंध में ढका खेत, चाय की गर्माहट और परिवार के साथ काम करने का आनंद—यह सब सिर्फ यादें नहीं, जीवन की ऐसी पूंजी है जो हमेशा दिल में चमकती रहती है।
गाँव की जिंदगी यही है—सरल, सच्ची और मेहनत से भरी। लेकिन इसी मेहनत में असली खुशियाँ छिपी होती हैं।
ऐसी ही और यादें शायद जीवन के किसी मोड़ पर फिर ताज़ा होंगी, लेकिन उस दिन की सरसों की कटाई… मेरे दिल में हमेशा-हमेशा के लिए दर्ज हो चुकी है।


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