दिसंबर का महीना आते ही गाँव की फिज़ा ही बदल जाया करती थी।
सुबह सूरज निकलने से पहले ही कोहरा खेतों पर चादर डाल देता था। कच्ची गलियों में चलना ऐसे लगता, जैसे धुंध के बीच से यादों को टटोलते हुए निकल रहे हों। दूर-दूर तक कुछ दिखाई नहीं देता था, बस ठंड की चुभन और साँसों से निकलती भाप ही एहसास कराती थी कि सर्दियाँ आ चुकी हैं।
सबसे प्यारी होती थी अलाव की गर्माहट। शाम ढलते ही गाँव के चौक या घर के आँगन में लकड़ियाँ सुलगने लगती थीं। बच्चे आग के पास बैठकर हाथ सेंकते, बूढ़े लोग पुरानी बातें छेड़ देते। कोई कहता—“पहले की सर्दी कुछ और ही थी”, और फिर किस्सों का सिलसिला चल पड़ता। वही किस्से, वही हँसी, वही अपनापन—जो अब सिर्फ़ यादों में बचा है।
सुबह-सुबह माँ की आवाज़ आती—“ज्यादा ठंड है, बाहर मत जाना।”
लेकिन हम कब मानने वाले थे। स्कूल जाने की जल्दी भी होती थी और छुट्टी की उम्मीद भी। कभी कोहरे की वजह से स्कूल बंद हो जाता, तो वो दिन त्योहार से कम नहीं लगता। सरसों के खेतों पर जमी ओस, पत्तों से टपकती बूंदें, और ठंडी हवा में उड़ते पक्षी—सब मिलकर दिसंबर को खास बना देते थे।
दिसंबर की रातें लंबी होती थीं। रजाइयों में दुबक कर बैठना, चूल्हे पर चढ़ी चाय की खुशबू, और बाहर पसरा सन्नाटा—सब कुछ जैसे समय को थाम लेता था। उस सन्नाटे में भी गाँव ज़िंदा रहता था, रिश्तों की गर्माहट के साथ।
आज भी दिसंबर आता है, सर्दी भी होती है, लेकिन वो बात नहीं रही।
अब अलाव कम, मोबाइल ज़्यादा हैं।
कहानियाँ कम, जल्दबाज़ी ज़्यादा है।
फिर भी…
जब दिसंबर की ठंडी हवा चेहरे को छूती है,
तो गाँव की वही सर्दियाँ,
वही अलाव,
वही मासूम दिन—
सब चुपचाप लौट आते हैं।

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