Tuesday, August 19, 2025

गाँव का लाउडस्पीकर और रामलीला की यादें

 ✍️ लेखक: L Suresh Kumar

गाँव की शामें यूँ तो हमेशा सुकून देती थीं, लेकिन नवरात्रों के दिनों में जो रौनक होती थी, उसकी बात ही कुछ और थी। जैसे ही दशहरा नज़दीक आता, गाँव के चौराहे पर एक पुराना लाउडस्पीकर बाँस की बल्ली पर बंधा नज़र आने लगता। उसी से घोषणा होती:
"
ग्रामवासियों को सूचित किया जाता है कि आज रात 8 बजे से रामलीला का शुभारंभ किया जाएगा। सभी समय पर पधारें।"

लोग समझ जाते — अब गाँव की असली शामें शुरू हो चुकी हैं।

हम बच्चे तो सुबह से ही बेसब्र रहते। स्कूल से आते ही पूछते —
"
आज कौन-सा प्रसंग है?"
"
राम-वनवास या सीता-हरण?"
"
हनुमान जी उड़ेंगे क्या आज?"

शाम होते ही हर गली से लोग जुटने लगते। चौपाल या स्कूल के मैदान में बँधा टैंट, मिट्टी के फर्श पर बिछी चटाइयाँ, और एक छोटा-सा मंच।
पीले बल्बों की रोशनी, मेकअप से पुते चेहरे और मोहरों वाले मुकुट पहने कलाकार — ये सब मिलकर हमारे लिए असली रामायण बना देते थे।

और सबसे ख़ास होता था वो लाउडस्पीकर।
जो दिन भर शंख-ध्वनि और "जय श्री राम" के भजन बजाता, और रात में पूरे गाँव को बाँध देता एक ही मंच के सामने। उसकी खड़खड़ाती आवाज़ में भी भावनाएँ इतनी गहरी होतीं कि सारा गाँव चुपचाप सुनता।

"हे राम, अब तुम हमें छोड़कर वन को जाओगे?"
राम का संवाद होता, और किसी बूढ़ी अम्मा की आँखें भर आतीं।
सीता-माता की वेदना सुनकर महिलाएँ आँचल से आँसू पोंछ लेतीं।

कभी-कभी कोई कलाकार संवाद भूल जाता, तो लाउडस्पीकर चुप हो जाता, और बच्चे हँसी से गूंज उठते।
"
अरे लक्ष्मण भूल गया!"
"
पंडित जी स्क्रिप्ट दे दो!"

लेकिन यही वो पल होते जो दिल में बस जाते। 

सबसे ज़्यादा उत्साह होता रावण-दहन का।
पूरा गाँव जमा होता, आतिशबाज़ियाँ होतीं, और जैसे ही राम जी तीर चलाते —
बड़ा-सा रावण धड़ाम से गिरता,
लाउडस्पीकर से गूंजती आवाज़:
"
सत्य की सदा विजय होती है!"

आज भले ही LED स्क्रीन, DJ और डिजिटल मंच आ गए हों,
लेकिन उस लाउडस्पीकर की खड़खड़ाहट, उन सादे संवादों और मिट्टी की खुशबू में बसी रामलीला की बात ही कुछ और थी।

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