Wednesday, August 20, 2025

गाँव में VCR लगाकर शादी की मूवी और फिल्में देखने की वो रातें

✍️ लेखक: L Suresh Kumar

सन् 90 के दशक की बात है। तब हमारे गाँव में टीवी भी हर घर में नहीं था, और मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन होता था — VCR और वीडियो कैसेट्स!
जब भी किसी की शादी होती या कोई त्योहार आता, गाँव में किसी एक बड़े आँगन में या स्कूल के बरामदे में VCR और रंगीन टीवी लाया जाता। साथ में होतीं कुछ फिल्मी कैसेट्स और नई-नई शादी की वीडियो रिकॉर्डिंग।

उस शाम का इंतज़ार बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक को होता। जैसे ही किसी ने कहा, "आज रात वीडियो लगेगा", पूरे गाँव में जैसे खुशी की लहर दौड़ जाती।
हम बच्चे तो दिन भर वहीं मंडराते रहते —
"
कौन सी फिल्म लगने वाली है?"
"
क्या 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' लाए हैं?"
"
भाईया, हमारी वाली शादी की कैसेट भी चलाना!"

शाम होते ही सफेद चादर दीवार पर टांगी जाती या फिर कोई पुराना टीवी सेट सेंटर में रखा जाता। VCR सेट किया जाता और कोई समझदार लड़का तैयार होता — "कौन सी कैसेट चलानी है?"
लोग चटाई, बोरियाँ और कभी-कभी अपनी चारपाई लेकर भी आ जाते। बच्चे आगे, औरतें एक किनारे, बुज़ुर्ग सबसे पीछे… और जैसे ही वीडियो शुरू होता — तालियाँ बजतीं, सीटियाँ बजतीं, और हर चेहरा चमक उठता।

अगर शादी की वीडियो होती तो पूरा गाँव उस दूल्हा-दुल्हन की चाल-ढाल, नाच-गाना और रस्में देखकर हँसता, कमेंट करता:
"
देखो बबलू कैसे नाच रहा है!"
"
अरे इसकी तो कमर ही नहीं हिल रही!"
"
मामी जी तो एकदम हिरोइन लग रही हैं!"

और जब फ़िल्म लगती — मानो पूरा गाँव सिनेमा हॉल बन जाता।
गोविंदा, अमिताभ, श्रीदेवी, माधुरी — सब गाँव में आ जाते। कुछ संवाद तो हम बच्चे पहले से ही याद करके बोलते:
"
बसंती, इन कुत्तों के सामने मत नाचना!"
तालियाँ और हँसी गूंज उठतीं

बीच में वीडियो रुक जाता, तो कोई दौड़कर प्लग देखता, कोई "ट्रैकिंग" एडजस्ट करता। फिर आवाज़ आती, "पानी ले आओ, चाय बनाओ, पकोड़ी भी तले हैं!"

रात के 1–2 बज जाते लेकिन मजाल है कोई उठे। नींद को मारकर भी आँखें खुली रहतीं, जब तक वीडियो खत्म न हो जाए। और सुबह सब उसी की बातें करते —
"
वो डांस देखा?"
"
वो सीन क्या ज़बरदस्त था!"
"
फिर कब लगवाओगे वीडियो?"

अब जब पीछे मुड़कर देखते हैं, वो वीडियो वाली रातें सिर्फ फिल्में नहीं थीं — वो हमारे बचपन की यादें थीं, गाँव की एकता थी, और उन दिनों की मासूमियत का आईना थीं।

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