✍️ लेखक: L Suresh Kumar
सावन आते ही जैसे पूरा गाँव हरियाली में नहा जाता था। आम, नीम और पीपल के पेड़ एकदम हरे-भरे हो जाते। खेतों में हरियाली लहराती और हवा में एक अलग ही मिठास घुल जाती थी। लेकिन हमारे लिए सावन का मतलब सिर्फ हरियाली नहीं था… इसका मतलब था — झूले और बारिश की मस्ती!
गाँव
की लड़कियाँ और
औरतें नई हरी-हरी चूनरियाँ ओढ़े,
हाथों में मेहंदी
लगाए, सुबह-सुबह
आँगन बुहारकर गुनगुनाने लगतीं
–
"कली-कली मुस्काई रे, सावन आयो रे…"
सबसे
मज़ेदार होता था झूला
डालना। बड़े पीपल
के पेड़ की
मोटी डाल पर
कपड़े की रस्सी
से झूला बाँधा
जाता। कोई पुरानी
साड़ी, कोई मज़बूत
रस्सी या कभी-कभी किसी के
कुर्ते से भी
काम चला लिया
जाता। झूला बनते
ही बच्चों की
टोली वहाँ टूट
पड़ती —
"पहले
मैं बैठूँगा!"
"नहीं!
मेरी बारी है!"
"तू
कल बैठा था,
आज मैं झूलूँगा!"
झूले
की सीट पर
बैठकर जैसे ही
हवा में ऊपर
जाते, पूरा आकाश
अपनी बाँहों में
भर लेने को
तैयार लगता। लड़कियाँ गीत
गातीं, और झूले
के साथ झूमता
था उनका मन।
"झूला पड़ा कदम्ब की डारी, सावन आयो रे!"
और
जब बरसात शुरू
होती, तब असली
मस्ती होती। बच्चे
खेतों में दौड़ते,
नंगे पैर कीचड़
में फिसलते, बारिश
की बूँदों को
हथेली में पकड़ने
की कोशिश करते।
माएँ छत पर
बाल्टी रखतीं, कपड़े
समेटतीं और अंदर से
चिल्लातीं —
"भीग
मत जाना! सर्दी
लग जाएगी!"
लेकिन बारिश में
भीगना तो जैसे
बचपन की ज़रूरत
थी। कोई भुट्टा
भूनने लगता, तो
कोई घर के
आँगन में फिसलकर
गिरता और जोर
से हँसता।
बारिश
थमने के बाद
सब घर लौटते,
मिट्टी की वो
सोंधी खुशबू साँसों
में बस जाती।
माँ गरम-गरम
पकौड़े तलती, और
सब मिलकर खाते
— बारिश के साथ
सजी एक यादगार
दावत!
आज
भी जब सावन
आता है, मन
उसी गाँव की
ओर भागता है
— उस झूले की
ओर, उस बारिश
की ओर, जहाँ
हर बूँद में
बचपन की हँसी
टपकती थी।
💚 अगर आपको यह कहानी पसंद आई हो तो —
👍 Like करें
📝 Comment में बताएं आपके गाँव में झूले कैसे होते थे?
📌 और नई कहानियों के लिए जुड़े रहें — "Meri Zindgi" ब्लॉग से

No comments:
Post a Comment