Monday, August 18, 2025

छुट्टी के बाद की असली मस्ती

 ब्लॉग: Meri Zindgi ✍️

गर्मी की छुट्टियाँ थीं और गांव का हर दिन किसी त्योहार से कम नहीं लगता था। सुबह जल्दी उठकर स्कूल जाना, लेकिन जैसे ही दोपहर में छुट्टी होती, हम बच्चों की असली मस्ती शुरू होती।

बैग फेंकते ही सीधा दौड़ पड़ते थे हम — कोई बिस्कुट लेकर आता, कोई रोटी में गुड़ लपेटकर, और कोई तो खाली हाथ लेकिन सबसे जोश में।
मकसद होता – भैंसों को लेकर खेतों की ओर चलना।

भैंसों की रस्सी पकड़कर हम उन्हें नहर किनारे या खेतों के पास ले जाते। जहां हरियाली होती, वहीं उन्हें बांध देते। लेकिन हमारा असली खेल तो तब शुरू होता।

तालाब का पानी गर्मी में भी ठंडा रहता था। कपड़े उतारकर कूद जाना, फिर कोई किसी की पीठ पर चढ़ता, कोई तालाब के किनारे से “बड़ा गोता” मारता।
भैंसें पानी में आधी डूबी रहतीं और हम उनके ऊपर बैठकर “राजा” बनने की कोशिश करते।

कभी-कभी, कोई भैंस डर जाती, तो हम सब डरते-डरते भी हँसते जाते।
तालाब के पास वो कीचड़, वो मेंढक, और वो पानी की खुशबू — आज भी दिल को गुदगुदा देती है।

शाम होने से पहले हम वापस लौटते, भीगी चड्डियों और गीले शरीर के साथ। माँ पहले डांटती —
"कहीं बुखार हो गया तो?!"
लेकिन फिर प्यार से तौलिया देती, और गर्म दूध भी।

"वो दिन, वो तालाब, वो भैंसों की रस्सी, और दोस्तों की टोली — सब जैसे अब भी दिल के किसी कोने में जिंदा हैं।
अब न वैसी छुट्टियाँ होती हैं, न वैसे तालाब मिलते हैं, लेकिन उन पलों की खुशबू अब भी सांसों में ताजा है।
सच कहें तो, बचपन की वो मस्ती ही असली जिंदगी थी..."


✨ क्या आपने भी कभी तालाब में भैंसों के साथ तैराकी की है? या स्कूल की छुट्टी के बाद किसी खास जगह जाते थे?
⬇️ नीचे कमेंट कर बताइए अपने बचपन की सबसे प्यारी याद!

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