✍️ लेखक: L. Suresh Kumar
सावन का महीना था। दिन भर की तेज़ धूप के बाद शाम को ठंडी हवा चलने लगी थी। खेतों में धान की फसल दूधिया हो चली थी और गाँव में चोरी की कुछ घटनाएँ भी सुनने को मिली थीं। उसी डर से पिताजी ने कहा –
“आज रात खेत में रखवाली करनी होगी बेटा, तू चल मेरे साथ।”
मैं तो थोड़ा सहम गया। रात में खेत? वो भी अंधेरे, सन्नाटे और भूतों की कहानियों के बीच? लेकिन पिताजी के साथ जाना था। एक हाथ में टॉर्च, दूसरे में लाठी थामे हम खेत की ओर निकल पड़े।
रास्ता पूरा कच्चा था, चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ। सिर्फ झींगुरों की आवाज़, दूर कहीं मेंढक की टर्र-टर्र और टॉर्च की पीली रौशनी में झिलमिलाते पेड़-पौधे। जैसे-जैसे हम खेत के करीब पहुँचे, मेरे दिल की धड़कनें तेज़ होती गईं।
खेत के एक कोने में नीम का बड़ा सा पेड़ था। रात में उसकी डालियाँ किसी भूतनी के बालों सी लटकती दिख रही थीं। मैं नज़रें नीची कर चल रहा था, जब अचानक किसी झाड़ी में से आवाज़ आई – "खड़-खड़!"
मैंने डर के मारे पिताजी की धोती ही पकड़ ली। वो हँस पड़े –
"अरे ये सियार होगा, भूत-वूत कुछ नहीं होता!"
हमने खेत के किनारे बने मचान पर बैठकर टॉर्च की रौशनी दूर-दूर तक फैलाई। चारों ओर अंधेरा और बीच-बीच में बिजली की चमक। तभी हल्की बारिश शुरू हो गई। टप-टप की आवाज़, मिट्टी की खुशबू और खेतों से आती हवा की सरसराहट… सब मिलकर माहौल को और डरावना बना रही थी।
थोड़ी देर बाद पिताजी ने मुझसे कहा –
"तू लेट जा, मैं देखता हूँ।"
मैं मचान पर एक बोरी बिछाकर लेट गया, लेकिन नींद कहाँ? हर झटपटाहट पर दिल धड़क उठता था।
रात का वो पहर — डर, बारिश, अंधेरा और खेत की रखवाली — मेरे जीवन की सबसे रोमांचक रातों में से एक बन गया।
"उस रात डर भी था, अंधेरा भी, लेकिन साथ था पिताजी का हाथ। वही हाथ जिसने सिखाया कि डर से लड़ो, भागो नहीं। और खेत… वो तो जैसे हमारे परिवार के सदस्य थे, जिनकी रखवाली हमारा फर्ज़ था।"
🌾 क्या आपने भी कभी खेतों की रखवाली की है रात के सन्नाटे में, जब हर पत्ता भी भूत जैसा लगता है?
आइए, लौटते हैं उस डर और साहस की दुनिया में, "Meri Zindgi" ब्लॉग के साथ – जहाँ हर कहानी एक याद बनकर फिर से जी उठती है।

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