Friday, August 29, 2025

चाय की भाप में भीगी यादें

 

हर शहर की अपनी खुशबू होती है... और खरड़ की खुशबू मुझे हमेशा उस छोटी सी चाय की दुकान की याद दिला देती है, जहां हमने न जाने कितने अधूरे किस्से पूरे किए, और पूरे सपनों की बातें छानी।

वो मोहाली से थोड़ी दूरी पर, बस स्टैंड के पास वाली गली में एक पुरानी सी दुकान थी – लकड़ी की बेंचें, दीवार पर पुराने पोस्टर, और कोने में टंगी हुई लटकती बल्ब की धीमी रो
शनी। वही हमारी दुनिया थी।

परमजीत सिंह... मेरा जिगरी दोस्त। पगड़ी बांधे, मुस्कुराता चेहरा, और दिल से बोलने वाला बंदा। हर शाम जब काम से फुर्सत मिलती, हम वहीं जमा हो जाते। दो कप चाय, एक प्लेट मट्ठी और घंटे भर की गपशप।

"भाई, एक दिन अपना ढाबा खोलेंगे," परमजीत अकसर कहता। मैं हँसता, "पहले चाय बनाना तो सीख ले, फिर होटल संभाल लेना!"
और फिर दोनों हँसते, जैसे दुनिया की सारी टेंशन उस चाय की भाप में उड़ जाती।

कभी क्रिकेट की चर्चा, कभी मोहब्बत की बातें, तो कभी बस यूं ही खामोशी में चाय की चुस्कियाँ। दुकान का मालिक भी हमें पहचानने लगा था — हमारी पसंद की चाय बिना कहे बना देता।

परमजीत का हौसला हमेशा ऊँचा रहता। वो कहता, "भाई, ये ज़िंदगी बस एक बार मिलती है, डर के नहीं, दिल से जीनी चाहिए।"

वक़्त गुज़रता गया... दोस्ती गहरी होती गई। आज भी जब मैं खरड़ की तरफ जाता हूँ, उस चाय की दुकान के सामने कुछ पल ठहर जाता हूँ। वहां की मिट्टी में अब भी हमारी हँसी की गूंज है, और परमजीत की वो आवाज़ –
"एक दिन अपना कुछ बड़ा करेंगे भाई..."

कुछ चाय की दुकानों में सिर्फ चाय नहीं मिलती... वहाँ ज़िंदगी के सबसे खूबसूरत पल मिलते हैं। परमजीत संग बिताया हर वो लम्हा, आज भी दिल को गरम रखता है – ठीक वैसा ही, जैसे खरड़ की चाय।

क्या आपके पास भी कोई ऐसा दोस्त है, जिसके साथ चाय की हर चुस्की एक याद बन जाती है? तो चलिए, लौटते हैं उन गली-मोहल्लों में, जहाँ दोस्ती अब भी चाय के प्यालों में मुस्कुराती है।

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