हमारे गाँव के दक्षिणी कोने पर एक पुरानी, जर्जर हवेली थी – जिसे सब "काली हवेली" कहते थे। ऊँची दीवारें, टूटती खिड़कियाँ, और झुकी हुई छत के नीचे हमेशा अजीब सी खामोशी पसरी रहती। कहते हैं ये हवेली रियास्तों के समय की बनी हुई है, इसमें कोई परिवार रहता था, जैसे पहले जागीरदार होते थे, बड़ी बड़ी हवेली होती थी, इसका रंग काला था। समय के साथ-साथ बदलाव हुए या आधुनिक जमाने के साथ इसमें रहने वाली पीढि़यों ने नए घर बना लिए। फिर ये हवेली वीरान हो गई। अब इस हवेली का एक छोटा सा भाग मेरे दोस्त ने भी खरीदा हुआ है। उसने एक छोटा कमरा बनाया है, पिछले 5-6 महीने से हम कमरे में संगीत की रिहर्सल करते थे। परन्तु पुराने समय में उस हवेली के पास जाने से भी डर लगता था।
हमारा स्कूल ठीक उसी रास्ते में पड़ता था। जब भी सुबह स्कूल जाना होता, हम पाँच-छह दोस्त झुंड में चलते। दिन में भी उस हवेली के पास से निकलते वक़्त हमारे कदम धीमे हो जाते। खिड़कियों से जैसे कोई झाँक रहा हो, कभी-कभी लगता कि किसी ने नाम लेकर बुलाया।
मेरा दोस्त राजू सबसे बहादुर था। एक दिन उसने कहा, "चलो आज शाम को हवेली के पास चलते हैं, देखते हैं आखिर है क्या वहां!" हम सब पहले तो मना करते रहे, लेकिन फिर बाल सुलभ जिज्ञासा के कारण हामी भर दी।
शाम को हम छुपते-छुपाते हवेली तक पहुँचे। बाहर का गेट जंग खा चुका था, लेकिन अंदर जाने का रास्ता खुला था। झाड़ियों को हटाकर जैसे ही हम आँगन में पहुँचे, अचानक ज़ोर की हवा चली और दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया। हम सब डर के मारे चीख पड़े।
लेकिन तभी अंदर से एक बुढ़िया की आवाज़ आई – “कौन है वहां?” दरवाज़ा खुला, और एक बूढ़ी दादी प्रकट हुईं। पता चला, वो इस हवेली में रहती थीं और गाँव वालों से अलग-थलग थीं, इसलिए डरावनी बन गई थी।
उस दिन के बाद वो हवेली हमें डरावनी नहीं लगी। अब हम दादी से मिलने जाते, उनकी कहानियाँ सुनते और कभी-कभी गर्म रोटियाँ भी खा लेते।
सीख: डर अक्सर अनजान चीज़ों से होता है। जब हम उसे समझते हैं, तो वो डर मिट जाता है।
"गाँव की हर गली अपनी एक कहानी कहती है, लेकिन हमारे बचपन की सबसे डरावनी यादें जुड़ी हैं उस वीरान 'काली हवेली' से — जहाँ से गुजरते वक़्त दिल की धड़कनें तेज़ हो जाती थीं।"
"जिस हवेली से हम डरते थे, वही अब हमें अपनों की तरह लगने लगी थी। शायद डर सिर्फ एक भ्रम होता है — जब पर्दा हटता है, तो पीछे एक कहानी मिलती है... और कभी-कभी एक अकेली दादी भी।"
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