Thursday, August 14, 2025

🌾 मेड़ पर बचपन – खेतों वाली मस्ती

 

लेखक – Suresh Kumar

गांव के खेत…
जहाँ गेहूं की बालियां झूमती थीं, सरसों के फूल सूरज से बात करते थे,
और मेड़ें — बस हमारा खेल का मैदान होती थीं।

हमारे लिए खेत में जाना किसी पार्क में जाने से कम नहीं था।
चप्पलें एक ओर फेंक दी जाती थीं, और हम नंगे पैर खेतों की मेड़ पर सांप की तरह लहराते हुए दौड़ते थे।
कोई कहता – "देख कौन पहले कुएँ तक पहुँचेगा!"
तो कोई सीटी बजाकर भाग जाता – जैसे कोई ट्रेन छूट रही हो।

मेड़ पर चलना एक कला थी।
कभी पतली होती, तो सीधे चलने की कोशिश करते,
और अगर पैर फिसल गया… तो कीचड़ में गिर कर गेंदे के फूल की तरह रंग-बिरंगे हो जाते।
पर न हम रोते थे, न शिकायत करते – बस फिर से चढ़ जाते थे मेड़ पर।

खेतों की मेंड़ों पर छुपम-छुपाई, मिट्टी से गुड्डे-गुड़िया बनाना,
और सरसों की झाड़ियों में छुप कर रस्सी से झूला बनाना —
ये सब वो मस्ती थी, जिसे ना मोबाइल चाहिए था, ना बैटरी।

कभी बैलगाड़ी गुजरती, तो हम पीछे से पकड़ कर फ्री की सवारी करते।
और खेत वाले चाचा डांटते – "अबे हटो! कहीं गिर पड़े तो...!"
पर वो डांट में भी एक अपनापन होता था।

दोपहर में जब धूप तेज़ होती,
तो नीम के पेड़ के नीचे बैठकर कच्चे आम खाते,
और अगर कोई छोटा बच्चा आ जाए, तो उसे बेवजह डराते –
"उस पेड़ पर चुड़ैल रहती है… तू इधर मत जाना!"

कभी-कभी तो हम खुद ही चुड़ैल बन जाते थे,
चादर ओढ़ कर झाड़ी में बैठ जाते,
और किसी को आते देखकर – "हँउऊऊ…" की आवाज़ निकाल देते।

वो बचपन की बेफिक्री,
वो मेंड़ों पर बिना डर के दौड़ना,
अब सिर्फ यादों में बचा है।

अब जब शहर की गलियों में हर सड़क पर सिग्नल है,
हर पार्क में बोर्ड लगा है – “खेलना मना है”,
तो उस खेत की मेड़ बहुत याद आती है,
जहां ना कोई रोक थी, ना कोई टोक।

सच में…
हम मिट्टी से ही तो बने हैं, शायद इसलिए खेतों की मेड़ पर हमें सबसे ज़्यादा आज़ादी मिलती थी।

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क्या आपने भी कभी मेड़ों पर बैलगाड़ी पकड़ी थी?
या किसी झाड़ी में चुड़ैल बनने की कोशिश की थी?

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