लेखक – Suresh Kumar
गर्मी की छुट्टियाँ शुरू होते ही हमारी पहली ज़िद होती थी –
"हमें नानी के घर जाना है!"
नानी का घर शहर से दूर,
एक छोटे से गांव में था — जहाँ मोबाइल का नेटवर्क कम,
पर मोहब्बत का नेटवर्क फुल था।
जैसे ही हम पहुंचते, नानी हमें गले लगा लेतीं और कहतीं –
"मोटे हो गए हो! अब देखो, यहां खूब आम खिलाएंगे!"
दोपहर ढलते ही हम और हमारे मौसेरे भाई-बहन निकल पड़ते आम तोड़ने।
नानी की बगिया में कई पेड़ थे – दशहरी, लंगड़ा, चौसा, और हम सब के हाथों में लकड़ी की लंबी लाठी होती।
कोई आम गिरता तो कोई भागकर पकड़ता।
कभी-कभी आम हमारे ऊपर ही गिरता और सब हँसी से लोट-पोट हो जाते।
फिर उन कच्चे-पक्के आमों को भूसे के ढेर में दबा दिया जाता –
"कल तक सब मीठे-पीले हो जाएंगे," नानी कहतीं।
शाम को हम नंगे पैर खेतों की ओर भागते –
पकड़म-पकड़ाई, गिल्ली-डंडा, और फिर आती वो सुहानी रात…
जब आसमान तारों से भर जाता,
और खेतों के पास की झाड़ियों से जुगनू निकलते।
हम सब दौड़ते, चुपके से पकड़ने की कोशिश करते।
काँच की बोतल में जुगनू को कैद करना,
हमें लगता था जैसे कोई छोटा सा तारा हमारी मुट्ठी में आ गया।
कभी नानी आवाज़ लगातीं –
"अब अंदर आ जाओ! ज्यादा देर बाहर मत रहो।"
पर हमें कहाँ सुनाई देता था।
अगले दिन भूसे से आम निकालते तो वो मिठास से चू रहे होते।
नानी आम का रस निकालतीं, रोटी में लपेटकर खिलातीं,
और हम कहते – “नानी! आपके हाथों का स्वाद कहीं और नहीं है…”
वो नानी का घर, वो भूसे की गर्मी में पकते आम,
वो रात के जुगनू और वो दिन भर की मस्ती…
सब अब स्मृतियों के भूसे में दबे हैं –
बस कभी-कभी मन करता है फिर से नानी के घर दौड़ जाएं।
👉 अगर आपको ये कहानी बचपन की किसी गली में ले गई हो,
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💬 क्या आपने भी कभी आम भूसे में पकाए हैं?
या जुगनू बोतल में बंद किए हैं?
तो फिर मिलते हैं अगली कहानी में…
जहां यादें होंगी, और हम होंगे – आप और मैं। 🌙

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