लेखक – Suresh Kumar
हमारे गांव में एक कुआँ था। पुराना, पथरीला, काई से भरा हुआ, लेकिन उसकी आबाज़ बहुत मीठी लगती थी जब उसमें रस्सी की बाल्टी गिरती थी।
कुएँ के पास जाना तो हर रोज़ की बात थी, लेकिन रात को उसका नाम भी लेने से डरते थे।
कहते थे – "इस कुएँ में एक औरत की आत्मा है, जिसने यहां कूद कर जान दे दी थी।"
कौन थी, क्यों कूदी – ये किसी को ठीक से नहीं पता, लेकिन गांव के बड़े-बुज़ुर्ग उसका ज़िक्र अक्सर करते थे।
एक बार की बात है — गर्मी की छुट्टियों में जब सब बच्चे दोपहर को खेलने गए थे,
तो मुझे एक दोस्त ने चैलेंज दे दिया – "अगर तू कुएँ की मुंडेर पर जाकर 5 मिनट खड़ा रहा, तो हम मान लेंगे तू सबसे बहादुर है!"
मैं भी क्या करता, हिम्मत कर के चला गया।
धूप में पत्थर गरम थे, लेकिन उससे ज्यादा कुएँ के भीतर झांकते ही जो ठंडक महसूस हुई, वो दिल दहला देने वाली थी।
ऐसा लगा जैसे कोई नीचे से मुझे देख रहा हो।
मैं खड़ा रहा… मिनट भर… दो मिनट…
फिर अचानक हवा चली और बाल्टी की रस्सी खचाक से हिली।
सच कहूं, दिल वहीं रह गया।
मैं दौड़कर वापस भागा। सब हँसने लगे, लेकिन मुझे यक़ीन हो गया — "कुछ तो है वहां नीचे..."
उस दिन के बाद जब भी मां कहती, "जा बेटा, कुएँ से पानी भर ला"
तो मैं झट से कहता, "आज नहीं मां… कल ले आऊँगा!"
पर अब जब वही कुआँ सूखा पड़ा है —
वो डर भी सूख गया है,
और उस डर की जगह अब सिर्फ किस्सों की नमी रह गई है।
अब जब उस पुराने कुएँ की दीवारों पर काई सूख चुकी है, बाल्टी की रस्सी टूट चुकी है,
और उसकी गहराई में अब न डर है, न पानी…
तो लगता है, डर तो हमेशा हमारे अंदर ही था — जो कहानियों में ढलकर हमारे साथ बड़ा होता गया।
आज उस कुएँ के पास से गुजरते हुए डर नहीं लगता,
बल्कि एक मीठी सी मुस्कान आती है —
कि कैसे बचपन में एक बाल्टी की आवाज़ से रूह काँप जाती थी।
कहानी तो बस एक बहाना है,
असल में तो ये हमारी यादों का कुआँ है –
जहाँ आज भी झाँको तो बचपन की परछाइयाँ दिख जाएंगी।
धूप तेज़ थी...
सूरज सिर के ठीक ऊपर, जैसे आसमान में तंबू गाड़े बैठा हो। हवा की एक भी सांस नहीं, बस गर्मी और सन्नाटा।
गांव के उस कोने में जहाँ पुराने पीपल का पेड़ कभी हुआ करता था, एक पत्थर का कुआँ आज भी अकेला खड़ा है। चारों ओर उखड़ी हुई ईंटें, काई जमी हुई दीवारें, और उस पर वक्त की मोटी परतें।
कुएँ की मुंडेर से सटी धूप और परछाई की लकीर दिखती है –
धूप गर्म है, लेकिन परछाई में कुछ अजीब है...
जैसे कोई वहाँ देख रहा हो।
उस कुएँ के पास एक छोटा लड़का खड़ा है।
करीब 9-10 साल का होगा। उसने पुरानी नीली शर्ट पहन रखी है, सिर पर पसीने की बूँदें हैं, हाथ में एक लकड़ी की छोटी सी छड़ी।
वो कुएँ की ओर झाँकने की हिम्मत नहीं कर पा रहा...
बस खड़ा है — बिल्कुल शांत, लेकिन उसके चेहरे पर हल्का सा डर है।
शायद दादी की कही बातें याद आ रही हों,
“बेटा, दोपहर में कुएँ के पास मत जाना... वहाँ ‘नीचे से’ कोई बुलाता है!”
और तब... एक धीमी सी सरसराहट!
शायद कोई छिपकली गुज़री हो,
या फिर उस डर की परछाई, जो कुएँ की गहराई में रहती है।
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या कोई बचपन की डरावनी बात जो आज भी याद आती हो?

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