Tuesday, April 28, 2026

वो तपती दोपहरें और गेहूँ की कटाई – बचपन की अनमोल यादें


आज जब हम पंखों, कूलर और ए.सी. की ठंडी हवा में बैठकर गर्मियों को कोसते हैं, तब कभी-कभी मन अपने आप उन दिनों में चला जाता है, जब न इतनी सुविधाएँ थीं और न ही आराम का कोई खास साधन। फिर भी जिंदगी में एक अजीब-सा सुकून था। वो दिन, जब तपती धूप, पसीने से भीगा शरीर और खेतों की मेहनत—सब कुछ मिलकर यादों का ऐसा खजाना बनाते थे, जिसे आज भी याद करके दिल भर आता है। 



उस दिन सूरज जैसे सुबह से ही गुस्से में था। उसकी तेज़ किरणें धरती पर आग बरसा रही थीं। सुबह उठते ही ऐसा लग रहा था जैसे रात भर भी गर्मी ने पीछा नहीं छोड़ा हो। घर में न कूलर था, न कोई ठंडी हवा देने वाला साधन—बस छत वाला पंखा और हाथ से झलने वाला पंखा ही सहारा थे। ऊपर से बिजली के कट लगते रहते, तो दिन का ज्यादातर समय हाथ वाले पंखे से ही काम चलाना पड़ता था।

उधर गेहूँ की कटाई शुरू हो चुकी थी। माँ ने आवाज़ लगाई—“उठ जा, सूरज सिर पर आ गया है, खेत में गेहूँ भी काटनी है।” मन तो बिल्कुल नहीं था जाने का, लेकिन माँ भी जानती थी कि बच्चे को कैसे मनाना है। कभी गन्ने के रस से बना “गोली वाला बत्ता” पिलाने का लालच देती, तो कभी कहती—“चल, आज गेहूँ काट लेंगे, फिर मामा के घर चलेंगे।” बस इतना सुनना था कि जैसे मन मान गया और हम खेत की ओर निकल पड़े।

हमने एक एकड़ ज़मीन ठेके पर लेकर गेहूँ बोई थी। अब उसे काटने का समय आ चुका था। सुबह-सुबह खेत में काम करना थोड़ा आसान लगता था, लेकिन जैसे-जैसे सूरज ऊपर चढ़ता, वैसे-वैसे धूप की तपिश असहनीय हो जाती। खेत की मेड़ पर एक किकर का पेड़ था, जिसकी छाया नाममात्र की थी। उसकी टेढ़ी-मेढ़ी टहनियों के बीच से सूरज की किरणें छनकर जमीन पर अजीब-सी छाया बना रही थीं।

मैं और मेरी माँ मिलकर गेहूँ काट रहे थे। पहले जब बड़ी बहन की शादी नहीं हुई थी, तब हम तीनों मिलकर काम करते थे। लेकिन अब माँ और मैं ही थे। कभी मैं खेत के कमरे से पानी लेने चला जाता, कभी चाय बनाने का बहाना कर लेता—बस थोड़ा आराम मिल जाए।

किसी तरह दोपहर तक गेहूँ काटी। फिर हम पेड़ के नीचे बैठकर खाना खाने लगे। पसीने से भीगा शरीर और हल्की-सी हवा—बस इतनी-सी ठंडक भी उस समय किसी वरदान से कम नहीं लगती थी। खाना खाकर थोड़ी देर के लिए वहीं लेट गए और कब नींद आ गई, पता ही नहीं चला।

अचानक लगा कि माँ गुस्से में मुझे डाँट रही है। पहले तो लगा कि सपना देख रहा हूँ, लेकिन जब आवाज़ फिर सुनाई दी तो मैं घबराकर उठ बैठा। देखा तो माँ वहाँ नहीं थी, बल्कि खेत में अकेली गेहूँ के बंधे हुए गट्ठर (भारी) बना रही थी।

मैं भागकर उसके पास गया, तो उसने गुस्से में कहा—“जा, सो जा! एक घंटे से उठा रही हूँ, पता नहीं कैसी नींद है!” तब देखा कि समय तीन बजे से ऊपर हो चुका था—लगभग दो घंटे सो चुका था मैं।

धीरे-धीरे मैं भी उसके साथ गट्ठर बाँधने लगा। कुछ देर बाद माँ का गुस्सा भी ठंडा हो गया। शाम करीब चार बजे मैं कमरे में जाकर चाय बनाने लगा। जब चाय लेकर आया और हम दोनों ने पी, तो जैसे शरीर में नई जान आ गई। सच में, काम करते वक्त चाय न मिले तो जैसे शरीर में फुर्ती ही नहीं आती।

शाम तक हम गेहूँ काटते रहे और कुछ गट्ठर बाँध दिए। गर्मियों में आँधी का कोई भरोसा नहीं होता—कभी भी आ जाए और कटी हुई फसल को बिखेर दे। मुझे आज भी याद है, एक बार हमारे दादा जी के भाई बनवारी लाल जी की पूरी गेहूँ की फसल आँधी में बिखर गई थी। फिर उन्होंने एक-एक तिनका इकट्ठा किया था।

वो अकेले ही पूरा खेत काट लेते थे। उस समय की मेहनत और ताकत अलग ही होती थी। आज की जवानी उस समय के बुजुर्गों के सामने भी फीकी लगती है।

शाम को अंधेरा होने लगा तो हम घर की ओर चल पड़े। रास्ते में सूखे पेड़ों की टहनियाँ भी इकट्ठी कर लेते, क्योंकि उस समय खाना चूल्हे पर ही बनता था। गैस तो जैसे किसी कहानी की चीज़ लगती थी।

घर पहुँचकर पानी से नहाए तो शरीर को एक अलग ही सुकून मिला। माँ ने फिर दुकान से “गोली वाला बत्ता” मंगवाया और हमें पिलाया। उस मीठे स्वाद में दिन भर की थकान जैसे घुल गई।



आज वो दिन भले ही लौटकर नहीं आ सकते, लेकिन उनकी यादें आज भी दिल को सुकून देती हैं। उस समय की मेहनत, सादगी और अपनापन ही असली दौलत थी। आज सुविधाएँ तो बहुत हैं, लेकिन वो सुकून कहीं पीछे छूट गया है।



दोस्तों,
ज़िंदगी में आगे बढ़ते हुए अपनी जड़ों को मत भूलिए।
क्योंकि असली खुशी उसी में छिपी है,
जहाँ मेहनत में सुकून था और सादगी में अपनापन। 

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