स्कूल की आख़िरी घंटी जैसे ही बजती थी, हमारे चेहरे पर एक अलग ही चमक आ जाती थी। बस्ता कंधे पर डालकर हम घर की ओर नहीं, बल्कि उस जिम्मेदारी की ओर दौड़ते थे जो आज सोचता हूँ तो किसी रोमांच से कम नहीं थी — भैंसों को चराने ले जाना।
हम चार-पाँच दोस्त इकट्ठे होते, कोई लाठी लेकर आता, कोई पानी की बोतल, तो कोई घर से जल्दी-जल्दी दो रोटियाँ बांधकर जेब में डाल लेता। घर से निकलते वक्त माँ की आवाज़ पीछे से आती —
"ध्यान से जाना, ज्यादा दूर मत निकल जाना!"
और हम हँसते हुए “हाँ” कहकर खेतों की ओर चल पड़ते।
खेतों के रास्ते और खुली आज़ादी
कच्चे रास्तों से गुजरते हुए, गेहूं या धान के खेतों के बीच से भैंसों को धीरे-धीरे हाँकते हुए हम आगे बढ़ते। धूप तेज़ होती, लेकिन हमें उसकी परवाह कहाँ थी। पैरों में चप्पल हो या न हो, मिट्टी से सने पांव ही हमारी पहचान थे।
हवा में घास की खुशबू घुली होती, कहीं दूर किसान हल चला रहा होता, और हम बच्चों की टोली अपनी ही दुनिया में मस्त रहती।
वो रास्ता सिर्फ खेतों से होकर जंगल तक नहीं जाता था —
वो रास्ता हमें बचपन की आज़ादी तक ले जाता था।
छोटा सा जंगल, बड़ा सा मैदान
जंगल जैसा दिखने वाला वह इलाका असल में पेड़ों का एक बड़ा झुंड था। वहीं हम भैंसों को खुला छोड़ देते। वे शांति से घास चरती रहतीं, और हमारी असली “ड्यूटी” तब शुरू होती — क्रिकेट खेलना!
किसी के पास असली बल्ला नहीं होता था। कभी लकड़ी का टुकड़ा ही बैट बन जाता, तो कभी ईंटों को जमा कर विकेट तैयार कर लेते। गेंद कभी रबड़ की होती, तो कभी टेप से लिपटी हुई पुरानी टेनिस बॉल।
मैदान बराबर नहीं था — कहीं घास, कहीं गड्ढे, कहीं मिट्टी के ढेर।
लेकिन उस असमान मैदान में भी हमारे सपने बहुत बड़े थे।
जब कोई छक्का मारता और गेंद पेड़ों के पार चली जाती, तो सब मिलकर उसे ढूंढने निकल पड़ते। उस खोज में भी एक अलग ही रोमांच होता था।
हँसी, शरारत और दोस्ती
बीच-बीच में हम भैंसों पर भी नजर रखते। अगर कोई दूर निकल जाती, तो सब मिलकर उसे वापस लाते।
कभी किसी की चप्पल टूट जाती, कभी कोई गिरकर मिट्टी में लथपथ हो जाता — और फिर शुरू होती हँसी की बरसात।
वो दोस्ती सच्ची थी, बिना किसी स्वार्थ के।
न मोबाइल था, न सोशल मीडिया।
बस आमने-सामने की हँसी, सच्ची बातें और दिल से निकली दोस्ती।
शाम की वापसी
जब सूरज ढलने लगता, आकाश हल्का नारंगी हो जाता, तब हमें याद आता कि अब घर लौटना है। भैंसों को फिर से इकट्ठा करके हम उसी रास्ते से वापस आते।
शरीर थका होता, कपड़े धूल से भरे होते, लेकिन दिल भरा होता — खुशियों से।
घर पहुंचते ही माँ डांटते हुए कहती,
"इतनी देर क्यों लगा दी?"
और हम मुस्कुरा कर चुप हो जाते।
उन्हें क्या पता था कि हम सिर्फ भैंसें नहीं चरा रहे थे —
हम अपने बचपन को जी रहे थे।
आज जब याद आता है…
आज शहर की भागदौड़ में, मोबाइल और जिम्मेदारियों के बीच जब वो दिन याद आते हैं, तो दिल भीग जाता है।
वो सादा जिंदगी, वो खुला आसमान, वो जंगल का मैदान, और दोस्तों के साथ खेला गया क्रिकेट —
सब कुछ जैसे किसी फिल्म का सुनहरा दृश्य लगता है।
शायद हमारे पास उस वक्त ज्यादा सुविधाएं नहीं थीं,
लेकिन खुशियां बहुत थीं।
वो दिन सिखा गए कि असली आनंद साधनों में नहीं,
साथ में होता है।
और आज भी दिल के किसी कोने में वो आवाज़ गूंजती है —
“चलो यार, भैंसें लेकर जंगल चलते हैं… और एक मैच हो जाए!”

No comments:
Post a Comment