कभी यही बारिश का पानी हमारे मोहल्ले की जान हुआ करता था।
पहली बूंद गिरते ही बच्चे घरों से बाहर निकल आते थे। कोई कागज़ की नाव बनाता, कोई नंगे पांव गलियों में दौड़ता। छतों से गिरती बूंदें जैसे संगीत बन जाती थीं, और गली का हर मोड़ एक उत्सव जैसा लगता था।
लेकिन आज…
वही बारिश का पानी चुपचाप बह जाता है।
न कोई नाव है, न वो शोर, न वो हँसी।
बस गीली सड़कों पर एक अजीब सी ख़ामोशी तैरती रहती है।
सच में, अब तो लगता है —
उदास फिरता है मोहल्ले में बारिश का पानी।
वो दिन भी क्या दिन थे…
बारिश शुरू होते ही हम छत से नीचे भागते थे।
माँ की आवाज़ पीछे से आती —
"बीमार पड़ जाओगे!"
और हम हँसते हुए और भी ज़ोर से पानी में कूद पड़ते।
गली में पानी भर जाता था, और वही हमारा छोटा सा “समंदर” बन जाता।
कागज़ की नावों की दौड़ लगती।
किसकी नाव सबसे दूर जाएगी, यही प्रतियोगिता होती।
कीचड़ में फिसलना भी खेल था,
भीग जाना भी खुशी थी।
बारिश का पानी तब बहता नहीं था —
हमारे साथ खेलता था।
अब क्यों उदास है बारिश?
आज वही गली पक्की हो गई है।
नालियाँ ढकी हुई हैं।
बच्चे मोबाइल में व्यस्त हैं।
और खिड़कियों से लोग सिर्फ बारिश देखते हैं, महसूस नहीं करते।
बारिश अब भी होती है,
पानी अब भी बहता है,
लेकिन वो इंतज़ार नहीं होता।
पहले बादलों की गड़गड़ाहट में उत्साह होता था,
अब ट्रैफिक जाम और गंदगी की चिंता होती है।
शायद बारिश नहीं बदली…
हम बदल गए हैं।
यादों की भी अपनी खुशबू होती है
कभी-कभी जब अचानक बारिश होती है,
तो मिट्टी की खुशबू के साथ बचपन भी लौट आता है।
आंखों के सामने वही गली घूम जाती है।
वही दोस्त, वही नाव, वही शोर।
और दिल के किसी कोने से आवाज़ आती है —
"चलो, फिर से भीगते हैं…"
लेकिन अब जिम्मेदारियाँ छाता बनकर सिर पर खड़ी हो जाती हैं।
हम भीगना चाहते हैं,
पर भीग नहीं पाते।
एक छोटी सी दुआ
काश किसी दिन फिर से वही बारिश आए,
जो सिर्फ सड़कों को नहीं,
दिलों को भी भिगो दे।
काश किसी दिन फिर से मोहल्ले में
कागज़ की नाव तैरे,
बच्चों की हँसी गूंजे,
और बारिश का पानी उदास न रहे।
क्योंकि सच तो यह है —
बारिश का पानी आज भी वही है,
बस उसे खेलने वाले बच्चे बड़े हो गए हैं।
और शायद इसीलिए…
उदास फिरता है अब मोहल्ले में बारिश का पानी। 🌧️

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