“मन का हो तो मिट्टी भी रंग है,
बेमन का रंग दाग बन जाता है।”
जीवन की सच्चाई इससे सरल शब्दों में शायद ही कही जा सकती है।
बात रंगों की नहीं है, बात मन की है।
अगर दिल राज़ी हो, तो साधारण चीज़ भी अनमोल लगती है।
और अगर मन ही साथ न दे, तो सबसे खूबसूरत चीज़ भी बोझ बन जाती है।
मन की स्वीकृति – असली सुंदरता
बचपन में हम मिट्टी में खेलते थे।
हाथ गंदे होते थे, कपड़े मैले होते थे,
पर चेहरे पर मुस्कान होती थी।
क्यों?
क्योंकि मन खुश था।
वही मिट्टी आज अगर मजबूरी में हाथ लग जाए,
तो हमें गंदगी लगती है।
असल में फर्क मिट्टी में नहीं,
मन की स्थिति में है।
बेमन का रंग – जो दाग बन जाता है
कई बार हम ऐसे काम करते हैं
जो मन से नहीं, मजबूरी से होते हैं।
रिश्ते निभाते हैं,
मुस्कुराते हैं,
त्योहार मनाते हैं —
पर भीतर से खाली रहते हैं।
तब वही रंग, जो खुशियाँ दे सकता था,
एक दाग सा महसूस होता है।
बेमन से किया गया प्रेम भी बोझ बन जाता है।
बेमन से निभाया गया रिश्ता भी थका देता है।
मन का रंग – जीवन को रोशन कर देता है
जब मन तैयार हो,
तो साधारण रोटी भी स्वादिष्ट लगती है।
छोटा सा घर भी महल जैसा लगता है।
सादा जीवन भी उत्सव बन जाता है।
मन का रंग ही असली रंग है।
बाकी सब तो बाहरी परतें हैं।
अगर हम हर काम में अपना मन जोड़ दें,
तो जिंदगी शिकायत नहीं,
एक सुंदर अनुभव बन सकती है।
इसलिए जरूरी है कि
हम अपने मन को समझें।
खुशी बाहर नहीं मिलेगी,
वह भीतर से उपजेगी।
अगर मन साफ हो,
तो मिट्टी भी सोना है।
और अगर मन भारी हो,
तो सोना भी बोझ है।
जीवन को रंगीन बनाने के लिए
रंगों की नहीं,
मन की जरूरत होती है।
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क्या आप जो कर रहे हैं, वह मन से कर रहे हैं?
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क्या आपके जीवन के रंग खुशी दे रहे हैं या दाग बन रहे हैं?
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क्या आपने अपने मन की आवाज़ सच में सुनी है?

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