कभी होली सिर्फ एक त्योहार नहीं होती थी, वह साल भर का सबसे बड़ा इंतज़ार हुआ करती थी। जैसे ही फागुन की हवा चलती, मन अपने आप रंगों में भीगने लगता। बचपन में होली का नाम सुनते ही आँखों में चमक आ जाती थी — न कोई चिंता, न कोई जिम्मेदारी… बस रंग, दोस्त और ढेर सारी मस्ती।
गाँव की होली – सादगी में छिपी असली खुशी
गाँव के खुले मैदान में हम सब बच्चे इकट्ठा होते। गन्ने की पाती, सूखी लकड़ियाँ और फूस जमा करते, ताकि रात को धूमधाम से होलिका दहन हो सके। उस आग की लपटों में जैसे हमारी सारी शरारतें चमकती थीं। ढोलक की थाप, बड़ों के गीत और बच्चों की खिलखिलाहट — पूरा गाँव एक परिवार बन जाता था।
सुबह होते ही असली युद्ध शुरू हो जाता था — रंगों का युद्ध!
कभी पिचकारी, कभी बाल्टी, कभी कीचड़ तक से होली खेल लेते थे। दिन भर भीगते रहते, ठंड लगती थी पर एहसास नहीं होता था।
और फिर माँ की आवाज गूँजती —
"इतना मत भीगो, सर्दी लग जाएगी!"
डाँट भी पड़ती थी, पर उस डाँट में भी कितना अपनापन था। हम बच्चे कहाँ मानने वाले थे? ठिठुरते हुए भी फिर बाहर भाग जाते थे।
आज की होली – मन में रंग, चेहरे पर जिम्मेदारी
आज भी जब होली आती है, मन कहीं वही बचपन ढूँढने लगता है।
रंग खरीदते समय याद आता है — पहले तो बस गुलाल से भी दुनिया रंगीन लगती थी।
अब जिम्मेदारियाँ हैं, काम है, समय की कमी है।
मन तो करता है कि फिर से उसी तरह खुले मैदान में भागें, दोस्तों को रंग से सराबोर कर दें, माँ की डाँट सुनें…
पर अब हम खुद किसी के लिए जिम्मेदारी बन चुके हैं।
होली आती है, रंग भी लगते हैं, पर वो बेफिक्री कहीं पीछे छूट गई है।
वो रंग जो कभी फीके नहीं पड़ते
शायद जिंदगी का यही सच है —
बचपन की होली शरीर से खेली जाती थी,
आज की होली यादों से खेली जाती है।
अब हम रंगों में कम, यादों में ज्यादा भीगते हैं।
पर दिल के किसी कोने में वो छोटा सा बच्चा आज भी फागुन का इंतज़ार करता है।
होली अब सिर्फ त्योहार नहीं रही,
वह एक एहसास है —
जो हमें याद दिलाता है कि कभी हम भी बेफिक्र थे।
शायद इस बार होली पर,
थोड़ा सा रंग जिम्मेदारियों से चुरा लें,
और अपने अंदर छुपे उस बच्चे को फिर से जी लेने दें।
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क्या आपको भी अपनी बचपन वाली होली याद आती है?
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इस होली, क्या आप अपने अंदर के बच्चे को फिर से रंगों में भीगने देंगे?
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अगर आपकी भी ऐसी कोई याद है, तो जरूर साझा करें।


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