Monday, February 9, 2026

लौटकर देखने की कोशिश

कभी-कभी जब ज़िंदगी बहुत तेज़ भागने लगती है,

तो मन करता है 



कि एक बार फिर
अपने गाँव की पगडंडी पर
धीरे-धीरे चला जाए।

आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ,
तो लगता है
गाँव सिर्फ़ जगह नहीं था,
वो मेरी पहचान था।


 तब का गाँव – जब वक़्त ठहर जाया करता था

तब गाँव की सुबह सुकून से आती थी।
कोई जल्दी नहीं थी, कोई दौड़ नहीं थी।

बच्चे खुले आसमान के नीचे बड़े होते थे।
मोबाइल नहीं, पर दोस्ती सच्ची थी।

हर घर का दरवाज़ा खुला रहता था,
हर इंसान अपना लगता था।


तब का बचपन – जब खुशियाँ खरीदी नहीं जाती थीं

तब खुशियाँ खरीदी नहीं जाती थीं, मिल जाती थीं।

गुलेल से निशाना लगाना, खेतों में लुकाछिपी खेलना,
और नदी किनारे घंटों बैठना — यही हमारी दुनिया थी।

हमारे सपने छोटे थे, पर नींद गहरी थी।


 अब का गाँव – बदला हुआ सच 

आज गाँव में पक्की सड़कें हैं, पर वो कच्चा अपनापन नहीं।

बच्चों के हाथ में मोबाइल है, पर मिट्टी नहीं।
दरवाज़े बंद हैं, और दिल भी।

गाँव अब भी है, पर गाँव जैसा नहीं लगता।


 तब और अब के बीच खोया कुछ

इस बदलाव में हमने बहुत कुछ पाया,
पर उससे ज़्यादा खो दिया।

आज सब कुछ तेज़ है — रिश्ते भी,
सपने भी, और ज़िंदगी भी।

तब ज़िंदगी आसान नहीं थी, पर सुकून वाली थी।


 यादें – जो आज भी साथ चलती हैं

आज भी जब मन बहुत भारी हो जाता है,
तो मैं अपने गाँव की यादों में कुछ देर बैठ जाता हूँ।

वो बचपन आज भी मुझे टूटने नहीं देता।


गाँव का बचपन

बीते वक़्त की चीज़ नहीं,
वो आज भी हमारे अंदर ज़िंदा है।

बस ज़रूरत है
उसे फिर से महसूस करने की।



“हम गाँव से बाहर आ गए,
पर गाँव
हमारे अंदर से कभी नहीं गया…”

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