Sunday, February 8, 2026

गाँव का बचपन

 वो बचपन भी कितना सच्चा था,

जब मिट्टी में सने पैर
और आँखों में बड़े-बड़े सपने हुआ करते थे…”


मेरी ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत किताब 


मेरे गाँव के बचपन से शुरू होती है।
ना महंगे खिलौने थे,
ना मोबाइल की दुनिया,
फिर भी हर दिन किसी त्योहार से कम नहीं लगता था।

गाँव की सुबह मुर्गे की बाँग से खुलती थी,
और रात दादी की कहानियों पर सुला देती थी।
यही मेरा बचपन था — सादा, सच्चा और बेफिक्र।


 मिट्टी से जुड़ा बचपन

मेरे बचपन के हाथों में मिट्टी लगी रहती थी।
कभी खेतों में भागते हुए, कभी नहर किनारे कागज़ की नाव बहाते हुए।

नंगे पैर स्कूल जाना, कंधे पर झोला और रास्ते में आम, जामुन तोड़ना —
ये सब मेरी ज़िंदगी की पहली खुशियाँ थीं।

उस समय हमें कम में जीना आता था, इसलिए शायद हम ज़्यादा खुश रहते थे।


 घर-आँगन और रिश्तों की गर्माहट

मेरे गाँव का आँगन सिर्फ़ ज़मीन नहीं था,
वो हमारी दुनिया थी।

सुबह गायों की घंटियाँ, माँ का चूल्हे पर खाना बनाना,
पिता का खेत की तरफ़ निकल जाना —
ये सब दृश्य आज भी मेरी आँखों में बसे हैं।

शाम को पूरा मोहल्ला एक ही चौपाल पर बैठता था,
जहाँ हँसी भी थी और अपनापन भी।


 बारिश और बचपन की शरारतें

बरसात आते ही गाँव का बचपन जाग उठता था। कागज़ की नाव, कीचड़ में फिसलना,
भीगते हुए खेतों से घर लौटना।

माँ की डाँट भी उस समय प्यारी लगती थी, क्योंकि उसमें फ़िक्र छुपी होती थी।

आज की बारिश बस पानी है, उस समय बारिश एक एहसास थी।


 सादे त्योहार, गहरी खुशियाँ

गाँव के त्योहार शोर नहीं करते थे, दिल में उतर जाते थे।

दीपावली पर मिट्टी के दीये, होली पर पानी और गुलाल, और सावन में झूले की आवाज़।

हमारे पास ज़्यादा नहीं था, पर जो था वो दिल से था।


 बचपन का जाना

वक़्त के साथ गाँव छूट गया, और बचपन भी।

आज शहर में सब कुछ है, पर वो सुकून नहीं
जो गाँव की रातों में तारों के नीचे मिलता था।

अब नंगे पैर नहीं चलते, पर मन आज भी मिट्टी को ढूँढता है।


मेरा गाँव, मेरा बचपन —

आज भी मेरी ताक़त है।
जहाँ से मैं चला था,
वही मेरी पहचान है।

अगर कभी ज़िंदगी भारी लगे,
तो अपनी जड़ों को याद करना —
वहाँ से फिर जीना सीख जाओगे।



“गाँव का बचपन कभी बूढ़ा नहीं होता,
बस हम बड़े हो जाते हैं…”

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