आज जब रात होते ही एक बटन दबाने से पूरा कमरा रोशनी से भर जाता है, तब कभी-कभी दिल अजीब-सा खाली हो जाता है। रोशनी है, पंखा है, मोबाइल है, फिर भी वो बात नहीं।
क्योंकि याद आती हैं गाँव की वो रातें,
जब बिजली चली जाती थी…
और अँधेरा डर नहीं, अपनापन बन जाया करता था।
अँधेरा, जो डराता नहीं था
गाँव में बिजली जाना कोई खबर नहीं होती थी।
ना कोई परेशान होता, ना कोई शिकायत।
बस जैसे किसी ने चुपचाप दिन का पर्दा गिरा दिया हो।
घर के आँगन में खाट बिछ जाती,
छत पर लोग चढ़ जाते,
और अँधेरे में भी सब कुछ साफ दिखाई देता था —
क्योंकि आँखें नहीं, मन देखता था।
आसमान में तारे ऐसे चमकते थे,
जैसे किसी ने काली चादर पर हीरे टाँक दिए हों।
आज शहर की रोशनी में वो तारे शायद शर्म से छुप जाते हैं।
लालटेन की रोशनी और किस्सों की गर्मी
घर के कोने से पुरानी लालटेन निकाली जाती थी।
उसकी पीली-सी रोशनी में
माँ का चेहरा सबसे ज़्यादा सुकून देता था।
दादी की आवाज़ गूँजती थी —
“हमारे ज़माने में तो बिजली का नाम भी नहीं सुना था…”
और फिर शुरू होते थे किस्से —
राजा-रानी के,
भूत-प्रेत के,
पुराने ज़माने की मेहनत के।
बच्चे डरते भी थे,
और उसी डर में मज़ा भी आता था।
आवाज़ों से भरी खामोशी
बिजली जाने के बाद
गाँव कभी चुप नहीं होता था।
कहीं झींगुर बोलते थे,
कहीं मेंढक टर्र-टर्र करते थे,
कभी दूर से कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आती थी।
वो खामोशी आज की तरह खाली नहीं थी,
वो ज़िंदा खामोशी थी।
ठंडी हवा और खाट का सुकून
गर्मी की रातों में
खाट पर लेटना किसी स्वर्ग से कम नहीं लगता था।
हाथ में पंखा,
आसमान में तारे,
और कानों में हवा की सरसराहट।
नींद धीरे-धीरे आती थी,
बिना किसी अलार्म, बिना किसी चिंता के।
आज AC है, बिस्तर है,
पर नींद अक्सर गुम हो जाती है।
रिश्तों की असली रोशनी
बिजली नहीं होती थी,
पर लोग एक-दूसरे के पास होते थे।
सब साथ बैठते थे,
बातें करते थे,
हँसते थे।
आज बिजली है,
पर हर कोई अपने-अपने स्क्रीन में कैद है।
तब अँधेरा था,
पर रिश्ते उजाले में थे।
बच्चों की शरारतें और मासूमियत
बच्चे छुपन-छुपाई खेलते थे,
कभी किसी को डराने की कोशिश करते थे।
कोई कह देता —
“उधर मत जाना, वहाँ कुछ है…”
और सब हँस पड़ते।
डर भी मज़ेदार होता था,
क्योंकि पास अपने लोग होते थे।
वो रातें, जो आज भी दिल में ज़िंदा हैं
आज जब बिजली चली जाती है,
तो सबसे पहले मोबाइल का नेटवर्क चेक करते हैं।
मन बेचैन हो जाता है,
जैसे कुछ खो गया हो।
पर गाँव की उन रातों में
कुछ भी खोया नहीं लगता था।
क्योंकि हमारे पास —
समय था,
लोग थे,
और सुकून था।
शायद इसलिए
आज भी जब अँधेरा होता है,
तो दिल कहीं गाँव की ओर भागता है।
वहाँ जहाँ —
बिजली जाती थी,
पर दिल कभी अँधेरा नहीं होता था।
वो रातें अब लौटकर नहीं आएँगी,
पर उनकी गर्माहट
आज भी हमारे अंदर ज़िंदा है… 🌙

No comments:
Post a Comment