जनवरी का महीना…
आम तौर पर धूप, हल्की ठंड और कोहरे की चादर ओढ़े सुबहें। लेकिन इस बार जनवरी ने अपना ही अलग मिज़ाज दिखा दिया। मौसम ने जैसे अचानक फैसला कर लिया हो कि अब सब कुछ उलट-पुलट होगा।
उस दिन रात के करीब 10 बजे थे। ऑफिस से निकलकर कमरे तक पहुँचने की जल्दी थी। आसमान में अजीब सी बेचैनी थी—हवा का रुख बदल चुका था। तभी अचानक आंधी शुरू हो गई। तेज़ हवाएँ, उड़ती धूल, पेड़ों की पत्तियाँ मानो किसी अनहोनी का इशारा कर रही थीं। जैसे-तैसे खुद को संभालते हुए मैं कमरे तक पहुँचा।
थोड़ी देर ही बीती थी कि बरसात ने दस्तक दे दी। पहले हल्की बूंदें, फिर तेज़ बारिश। जनवरी की ठंड में बरसात—ये एहसास अपने आप में अजीब था। बाहर निकलना तो दूर, खिड़की से देखना भी डराने लगा था। हवाएँ इतनी तेज़ थीं कि खिड़कियाँ थरथरा रही थीं।
पूरी रात और अगला दिन – प्रकृति का कहर
वो बरसात सिर्फ कुछ घंटों की नहीं थी। अगले पूरे दिन तक आंधी चलती रही, और बारिश रुक-रुक कर होती रही। हर बार लगता कि अब थम जाएगी, लेकिन थोड़ी देर बाद फिर तेज़ हवा और बूंदों की आवाज़ शुरू हो जाती।
शहर का हाल बिगड़ने लगा।
कई जगह पेड़ गिर गए, कहीं सड़क पर, कहीं बिजली के खंभों पर। जगह-जगह बिजली गुल हो गई। मोबाइल चार्ज करना भी मुश्किल हो गया—आज के समय में बिजली चली जाए तो जैसे इंसान आधा कट जाता है दुनिया से।
सड़कों पर लगे रेड लाइट के खंभे गिर चुके थे। ट्रैफिक पूरी तरह अस्त-व्यस्त। कुछ जगहों पर पेड़ सीधे बिजली के खंभों पर गिर गए थे, जिससे पूरे इलाके की लाइट चली गई। अंधेरा, ठंड और सन्नाटा—तीनों मिलकर माहौल को और भारी बना रहे थे।
बेचैनी और असहायता का एहसास
जब मोबाइल की बैटरी कम होने लगती है और चार्ज करने का कोई साधन न हो, तब इंसान को अपनी निर्भरता का एहसास होता है।
न न्यूज़ देख पा रहे थे, न मौसम की सही जानकारी। बस बाहर की आवाज़ें और मन के भीतर की चिंताएँ।
लोगों के चेहरे पर डर साफ़ दिख रहा था—
“कब रुकेगी ये आंधी?”
“कहीं और नुकसान न हो जाए।”
रेडियो और सोशल मीडिया पर खबरें आने लगीं कि अगले दिन भी बारिश के आसार हैं। ये सुनकर मन और घबरा गया। ठंड पहले ही ज्यादा थी, और अगर बारिश और चली तो हालात और मुश्किल हो सकते थे।
राहत की सुबह
लेकिन प्रकृति हर बार सिर्फ परीक्षा ही नहीं लेती—कभी-कभी राहत भी देती है।
अगली सुबह जब आँख खुली, तो खिड़की से आती रोशनी कुछ अलग लगी। बाहर देखा तो धूप निकल आई थी। बादलों के बीच से झांकती सूरज की किरणें मानो कह रही हों—अब थोड़ा सुकून मिलेगा।
वो धूप सिर्फ शरीर को नहीं, मन को भी राहत दे रही थी।
आंधी थम चुकी थी, बारिश रुक गई थी।
लोग धीरे-धीरे बाहर निकलने लगे, नुकसान का जायज़ा लेने।
पहाड़ों पर बर्फ और बढ़ती ठंड
हालांकि राहत पूरी नहीं थी। खबरें आईं कि पहाड़ों पर भारी बर्फबारी हुई है, जिससे ठंड और बढ़ गई है। ठंडी हवाएँ अब और तीखी हो चुकी थीं। पहाड़ों की बर्फ का असर मैदानी इलाकों तक महसूस होने लगा।
जनवरी ने इस बार सिखा दिया कि मौसम अब पुराने नियमों पर नहीं चलता। कभी गर्मी सर्दी में आ जाती है, तो कभी बरसात ठंड के बीच दस्तक दे देती है।
एक सीख
इस पूरे अनुभव ने एक बात फिर याद दिला दी—
प्रकृति के सामने इंसान कितना छोटा है।
हम अपनी योजनाओं, समय-सारिणी और तकनीक पर कितना भी भरोसा कर लें, लेकिन मौसम का एक झोंका सब बदल सकता है।
और जब धूप निकलती है, तो उसकी क़ीमत और ज़्यादा समझ में आती है।

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