रात के 10 बजे थे। शहर की भागदौड़ अब धीमी हो चुकी थी, लेकिन मेरे दिल में हलचल थी — आज घर जाना था। सप्ताह में एक ही दिन घर जा पाता हूँ, तो उस रात का इंतज़ार खास होता है।
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| "एक रात की बरसात में, जब रास्ता लंबा था, और मैं अकेला था — लेकिन हौसला मेरे साथ था।" |
एक पेट्रोल पंप पर रुककर थोड़ी देर छुपा। उम्मीद थी कि बादल कुछ देर में थम जाएंगे, मगर नहीं थमे। मजबूरी थी, जाना तो था ही — अपने कपड़े, मोबाइल और पर्स को बड़े लिफाफे में संभालकर मैंने बारिश में चलने का फैसला कर लिया।
रास्ते में सड़कों पर अंधेरा था, सिर्फ आती-जाती गाड़ियों की रोशनी ही साथ थी। हवा तेज थी, बारिश और तेज लग रही थी। पानी की बूंदें जैसे सुइयों की तरह चेहरे से टकरा रही थीं। हाथ जमा रहे थे, पैर ठिठुरने लगे थे, लेकिन रुकना मुमकिन नहीं था।
एक घंटे की लड़ाई के बाद अंबाला पहुँचा — थोड़ा सुकून मिला, बारिश अब हल्की हो चुकी थी। लेकिन जैसे ही हाईवे पर चढ़ा, बाइक एकदम से बंद हो गई। मन में डर आया — "अब क्या होगा?"
शुक्र था, कुछ देर में बाइक फिर स्टार्ट हो गई।
फिर से बारिश शुरू हो गई — लेकिन अब शरीर भीगने का आदि हो चुका था। अब मैं भी उसका हिस्सा बन चुका था। भीगते हुए, कांपते हुए, मैं लगभग 30 मिनट और चला। जब घर 12:30 बजे रात को पहुँचा, तो शरीर थक चुका था — लेकिन दिल पूरी तरह सुकून में था।
वो रात सिर्फ एक सफर नहीं थी, वो एक इम्तहान थी — और मैं उसमें खुद को पा सका।
घर की रौशनी में भीगे चेहरे पर मुस्कान थी। उस रात ने मुझसे बहुत कुछ कहा —
कभी-कभी रास्ते मुश्किल होते हैं, लेकिन जो चलता रहता है, वही पहुँचता है।
कुछ रास्ते हमें थका देते हैं, और कुछ रास्ते हमें बना देते हैं।
उस रात मैं भीगा तो था, लेकिन अंदर से और मज़बूत होकर लौटा।
“क्या आपने भी कभी ऐसी कोई बारिश में भीगी रात जी है? अपने अनुभव कमेंट में जरूर साझा करें।
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