👻 “जब मैं खुद ही भूत बन गया!”
✒️ लेखक: सुरेश कुमार के अनुभव पर आधारित
कभी-कभी ज़िंदगी ऐसे मोड़ पर ले आती है जहाँ हँसी और डर का फर्क मिट जाता है। यह कहानी उस रात की है जब मैं एक टीवी सीरियल देखने गया था — लेकिन पड़ोसियों ने मुझे भूत समझ लिया! हाँ, आप सही पढ़ रहे हैं — एक असली ज़िंदगी की मज़ेदार और थोड़ी डरावनी घटना, जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता।
यह बात उन दिनों की है जब DD1 पर 'सुराग' सीरियल हर रविवार को आता था।
रात के 9 बजे का समय, आसमान में बादल और अचानक...
बिजली गुल! ⚡
मैंने सोचा, चलो पड़ोस में जाकर सीरियल देख लिया जाए।
पड़ोस में गया तो देखा — घर अंदर से थोड़ा अंधेरा है,
बस टीवी की नीली रोशनी टिमटिमा रही थी।
Uncle और Aunty अपनी-अपनी चारपाई पर सो रहे थे,
और मैं, चुपचाप उनके पास ज़मीन पर बैठकर सीरियल देखने लगा।
कुछ देर तक सब शांति से चला...
फिर अचानक — Aunty की आँख खुली!
उन्होंने अंधेरे में मुझे देखा, और ज़ोर से चीखीं:
“भूत! भूत! भूत बैठा है!” 😱
Uncle एकदम चौककर उठे —
“हाय राम! मुझे मत पकड़! मुझे छोड़ दे!”
और वो अपनी चादर से मुँह ढाँप कर काँपने लगे।
मैं हक्का-बक्का, बोला:
“Uncle! Aunty! मैं हूँ… सुरेश! भूत नहीं!” 😅
लेकिन तब तक डर का माहौल बन चुका था।
Aunty की साँसें तेज़, Uncle का दिल धड़क रहा था…
और मैं, अपनी हँसी रोकते-रोकते पसीना-पसीना!
कुछ मिनटों बाद सब शांत हुए।
Uncle ने चश्मा लगाया, पहचान हुई —
फिर बोले,
“अरे सुरेश! तू है… हमें तो सच में लगा कोई चुड़ैल आ गई!”
📚 सीख:
कभी-कभी अंधेरे, सन्नाटे और टीवी के साथ एक शांत बैठा लड़का भी डर का कारण बन सकता है!
और…
हर भूत सच में भूत नहीं होता — कभी-कभी वो सिर्फ Suresh होता है! 😄
इस पूरी घटना ने मुझे एक बात सिखाई — जब लाइट ना हो, तो टीवी देखने ना जाएं... और अगर जाएं तो किसी को जगा कर जाएं! 😄
भूत नहीं था, लेकिन उस रात मैं सबसे बड़ा डर बन गया था।
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