आज बहुत दिनों के बाद, दिनों भी नहीं, सालों बाद बस में सफर किया। बस में सफर बाइक के सफर से सौ गुना ज्यादा मजेदार लगा। अंबाला में दफ्तर का आज दूसरा ही दिन था। छुट्टी करके गांव के लिए निकल पड़ा। वैसे तो छुट्टी 6 बजे होती है। काम ज्यादा ना होने के कारण ऑफिस से जल्दी ही निकल पड़ा। थोड़ी देर पहले बरसात हुई थी, लेकिन बरसात के होने से गर्मी और उमस में ज्यादा ही बढ़ोतरी हो चुकी थी। 10 मिनट तक मानव चौंक पर खड़ा रहा।
थोड़ी देर में दो सरकारी बसें आई, पर मेरे काम की नहीं थी। थोड़ी देर में एक प्राइवेट बस आ गई। जल्दी से सभी सवारियां उसमें सवार हो गईं। बस में बैठने के लिए जगह नहीं थी। जितनी सवारियां सीटों पर बैठी थी उतनी है बस में खड़ी थी। कंडक्टर ने सीटी बजाई। बस धीरे धीरे भीड़ वाली सड़क से निकलती हुई रफ्तार पकड़ने लगी। बस में मेरे साथ वाली सीट पर एक महिला अपने बेटे के साथ बैठी थी। उनको ठोल उतरना था। वह अपने बटन वाले फोन से अपने घर फोन मिलाकर बताने लगी कि में 20 मिनट में ठोल पहुंच जाऊंगी। वह बार बार फोन मिला रही थी, काफी देर बाद उसका फोन मिल गया। वह इतनी जोर से बोली, कि सभी उसकी तरफ देखनी लगी। फिर वह बेचारी संकुचाई सी धीरे धीरे बोलने लगी। उसके बेटे ने उससे फोन छीन लिया और वह भी बात करने लगा। उनकी बोलचाल से लग रहा था कि वे बिहार के थे। महिला ने अपने बेटे के लिए लेज का पैकेट लिया हुआ था। महिला ने उस पैकेट को खोल कर दो चार लेज ले लिए और बाकी पैकेट बेटे को दे दिया। लेकिन वह लेने से मना करने लगा। वह रूठ कर बैठ गया कि उस पैकेट से लेज क्यों लिए। महिला ने बड़ी मुश्किल से उसे मनाया। मैं उनकी सीट के पीछे खड़ा सब देख रहा था और मन ही मन हंस भी रहा था। उस बच्चे के बचपन को में भी तब जी रहा था। बस से बाहर का नजारा बहुत ही मनमोहक लग रहा था। बस सभी सवारियों को अपने अंदर समेटे हुए अपनी मंजिल को तरफ बढ़ती चली जा रहा थी। कंडक्टर सवारियों को उनके अड्डे पर उतरने के लिए आवाजें दे रहा था। ठोल आते आते लगभग आधी बस खाली हो चुकी थी। लगभग 40 मिनट बाद मेरी मंजिल भी आ चुकी थी। मैं उतार गया। और बस को आगे जाने के लिए जाने दिया। काफी दिनों बाद बस का सफर बहुत ही मनमोहक लगा।
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