Wednesday, October 27, 2021

आज पुरानी राहों से फिर याद हो आयी स्कूल की वो मीठी सी याद

 आज स्कूल में आधी छुट्टी के समय बच्चों को खेलते देख कर मैं उनमें से अपने आपको खोज रहा था। कोई बच्चा पेड़ के पीछे छुप कर खड़ा था, तो एक बच्चे ने पीछे से आकर उसको दफ्फा दिया जैसे एक पुलिस वाले ने चोर को ढूंढ निकाला है। कुछ बच्चे पकड़न पकड़ाई खेल रहे थे। सभी बच्चे एक दूसरे से टकराते भाग दौड़ रहे थे। पर किसी के मन में चोट खाने या जख्मी होने का डर नहीं था। 


मुझे उन बच्चों को खेलते देख कर अपना बचपन याद आ गया। सुबह जब स्कूल पहुंचते थे तो आधी छुट्टी होने का इंतजार रहता था।  एक दूसरे के पीछे भागकर पकड़ना किसी मेडल मिलने से कम नहीं होता था। और जब कोई हमें भागकर पकड़ता ओर ना पकड़े जाने पर हार मान लेता तो आज के ओलिपिक में मेडल जीतना उस खुशी का मुकाबला नहीं कर सकता। अपने आप ही हम फुले नहीं समा रहे होते थे। और जब कोई आकर हमारी तारीफ कर देता तो कहना ही क्या था। आज जब मैं सड़क पर स्कूल के गेट के सामने खड़ा था तो कुछ बच्चे मेरे पास आए और मुझसे पूछा कि अंकल क्या अक्षित को बुलाना है। मैंने मना कर दिया। मेरा बेटा अक्षित उस स्कूल में पढ़ता है। फिर वो चले गए और अपने खेल में मशरूफ हो गए। वैसे तो हम कभी समय पर स्कूल नहीं पहुंचे थे परन्तु जिस दिन जल्दी चले गए , उस दिन सुबह ही धमाचौकड़ी मचा देते थे। हम अपने समय की तुलना आज से करते हैं तो हमें लगता है कि पहले हम छोटी छोटी कक्षाओं में इतने बड़े बच्चे होते थे और आज छोटे छोटे बच्चे बड़ी बड़ी कक्षाओं में हैं। हम कक्षा में सबसे पीछे बैठते थे। वहां बैठे बैठे भी पूरी मस्ती किया करते थे। एक बार चाचा का लड़का दर्शन, एक दोस्त अनिफ अली, सलीम अली और बलवान हम बैठे हुए थे कि दर्शन ने गुलेल देकर कहा कि सामने मेज पर रखी गेंद को निशाना लगाना है। वह हमसे कोई 14-15 फीट पर थी। मैंने गुलेल से निशाना साधा और गुलेल में एक छोटा सा पत्थर डाल कर छोड़ दिया। निशाना सीधा गेंद पर जा लगा। मुझे उस समय ऐसा महसूस हुआ जैसे मुझे ओलंपिक में शूटिंग का गोल्ड मेडल मिल गया हो। नौवीं ओर दसवीं कक्षा करके फिर हमने पास के गांव ठोल में ग्यारवीं कक्षा में दाखिला ले लिया। पुराने दोस्त छूट गए, नए दोस्त बन गए। इसी तरह से चलता रहा मेरी ज़िन्दगी का ये खट्टा मीठा सफ़र।


ऐसे ही पुरानी यादें लेकर फिर से हाजिर होंगे मेरी ज़िन्दगी के ये हसीन पल।  

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