क्या सच में गर्मी बढ़ गई है, या हम बदल गए हैं?
गर्मी — ये शब्द सुनते ही मन में सूरज की वो लाल-लाल आंखें कौंध जाती हैं, जैसे आजकल इमोजी में बना गुस्सैल सूरज!
क्या वाकई सूरज को अब पहले से ज़्यादा गुस्सा आने लगा है?
जो कभी अपने सुनहरे प्रकाश से जीवन देता था, वो अब जैसे आग उगलता है। पहले वो एक *नरमदिल राही* लगता था, अब किसी *क्रोधित तपस्वी* सा प्रतीत होता है। शायद अब उसकी भी सहनशक्ति कमज़ोर हो गई है, ठीक हमारी तरह।
कभी-कभी लगता है — कहीं ऐसा तो नहीं कि उसके दोस्तों ने उसे अपनी दुनिया में खेलने से मना कर दिया हो? और अब वो अपनी नाराज़गी पृथ्वी पर बरसा रहा है।
बचपन में जब हम आपस में लड़ जाते थे, तो घर आकर उस गुस्से का असर परिवार वालों पर उतारते थे। शायद सूरज भी वैसा ही कर रहा है।
पर सवाल ये है — क्या सूरज सच में अब ज़्यादा गर्म हो गया है, या फिर **हम ही बदल गए हैं?**
तब और अब: गांव की तपती धूप बनाम शहर का एसी कमरा
गांवों में आज भी लोग गर्मी को वैसे महसूस नहीं करते जैसे शहरों में होता है।
पहले के लोग खेतों में, खुले आसमान के नीचे, धूप में काम करते थे। और आज हम एयर कंडीशनर वाले कमरों में बैठकर कहते हैं — “बहुत गर्मी है!”
जब तक AC की ठंडी हवा चलती है, गर्मी का अहसास नहीं होता। लेकिन जैसे ही बाहर निकलते हैं — सूरज दुश्मन लगने लगता है।
गांव में लोग अब भी खेतों में मेहनत करते हैं, पर शिकायत कम करते हैं। मैं जब गांव जाता हूं और ताया जी से कहता हूं, “आज तो बहुत गर्मी है”, तो वो मुस्कुराकर जवाब देते हैं — “हर रोज़ ऐसी ही होती है बेटा।”
**बचपन की वो दोपहरें...**
जब गर्मी की छुट्टियां होती थीं, हम स्कूल से आते ही बैग फेंक कर भाग जाते थे खेलने — धूप है या नहीं, इसकी परवाह नहीं थी।
ना AC था, ना sunscreen, और ना ही किसी ने कहा था कि “धूप में मत जाओ, बीमार पड़ जाओगे।”
हम बिना चप्पल के धूप से तपती सड़कों पर दौड़ते थे। लुक (सड़क की पिघली टार) को डंडे से खुरचकर गोले बनाते थे। वो गोले हमारे खिलौने थे।
हम "लुक" को डंडे से खुरचते थे, उसका गोला बनाकर खेलते थे। नींबू पानी स्वाद के लिए पीते थे, न कि सेहत बचाने के लिए। पेड़ों पर दोपहर में झूला डाल कर खेलना, झोपड़ी में बैठ कर चूरन खाना, और बालों में लुक लगने पर मम्मी की डांट खाना — सब कुछ आज भी दिल को गुदगुदाता है।
कभी-कभी वो लुक कपड़ों में चिपक जाती थी, और जब मम्मी कपड़े धोती थीं, तब उनका पारा सूरज से भी तेज़ हो जाता था। अगर वही लुक बालों में चिपक गई तो फिर या तो बाल कटते थे, या डीज़ल से धुलते थे!
एसी से बाहर निकलो, तब समझो “धूप” क्या होती है
शहरों में रहने वाले एसी रूम से बाहर निकलते ही चीख उठते हैं — “आज तो धूप झुलसा रही है!”
पर सच में क्या धूप पहले से ज़्यादा तेज़ हो गई है?
गांव में ताया जी कहते हैं, “हर दिन ऐसी ही होती है बेटा, फर्क बस तुम्हारे अंदाज़ देखने का है।” और वाकई, जब खेतों में काम करने वाले आज भी बिना शिकन के जीते हैं, तो लगता है — गर्मी की असली ताकत हमारी आदतों में ही छिपी है।
**डर और खेल साथ-साथ चलते थे**
हमें डराया जाता था कि दोपहर में पेड़ों पर भूत होते हैं। पर भूत भी शायद हमारे उत्पात से डर जाते थे।
हम दोपहर में झूले डालकर खेलते थे — पील पलंगड़ा, जूत पलो, रस्साकशी — सब खेल दोपहर की जलती दोपहरों में ही होते थे।
और अब?
बच्चे धूप में निकलें नहीं कि मां उन्हें डांटते हुए अंदर बुला लेती है।
बच्चों के मन में बिठा दिया गया है — "धूप में गए तो बीमार हो जाओगे।"
**गांव का सुकून, शहर की आदतें**
गांवों में आज भी दोपहर में भैंसों को लेकर बच्चे निकलते दिख जाते हैं। जब उन्हें देखता हूं, तो लगता है — मेरा बचपन अब भी कहीं सांस ले रहा है।
आजकल किसी को अगर तेज़ धूप में बाहर जाना पड़ जाए, तो पहले वो कई बार सोचता है। फिर भी जाना ही पड़े तो छाता लेकर, मुंह-कपड़ा बांधकर — जैसे धूप उसका खून चूस लेगी।
और ये स्टाइल लड़कियों में फैशन की तरह देखा जाता है — अब पता नहीं सच में धूप से बचने के लिए होता है या सोशल मीडिया की तर्ज पर।
अब गर्मी नहीं लगती, बस एहसास बदल गया है
आजकल धूप से बचने के लिए लोग छाते, चश्मे, स्कार्फ, और फुल कवरिंग के साथ निकलते हैं — जैसे किसी युद्ध पर जा रहे हों।
धूप से ज्यादा डर फैशन का है या त्वचा का रंग काला हो जाने का — यह कहना मुश्किल है।
गर्मी आज भी वही है, सूरज भी वही है, सिर्फ हमारी सोच और जीवनशैली बदल गई है।
**तो क्या बदल गया है? सूरज या हम?**
सच तो ये है कि सूरज आज भी वैसा ही है। **बदलाव हमारे अंदर आया है।**
हमारी आदतें, हमारा रहन-सहन, हमारा नज़रिया — सब बदल चुका है।
अब गर्मी से ज़्यादा हम **गर्मी का डर** महसूस करते हैं।
शायद इसीलिए सूरज पहले जैसा नहीं लगता — क्योंकि हम पहले जैसे नहीं रहे।
🌿 अंत में...
कभी गांव जाइए, किसी बुजुर्ग के पास बैठिए, और पूछिए — "गर्मी पहले कितनी लगती थी?"
वो मुस्कुराते हुए कहेंगे — “गर्मी तो अब भी वही है बेटा, पर अब बच्चों में गर्मी सहने की ताकत नहीं रही।”
**आपका क्या ख्याल है — सूरज बदला है, या हम...?**
👇 अपनी राय नीचे ज़रूर लिखें।

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