लेखक – Suresh Kumar
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में बचपन की वो बेफिक्री कहीं खो सी गई है। जब हम साइकिल चलाना सीखते थे, तब लगता था जैसे हम कोई बड़ा कमाल कर रहे हों। पहले तो साइकिल सिर्फ खड़ी करते थे, फिर क्रेंची चलाना सीखा – यानी पैडल घुमाने की कलाकारी। उसके बाद आया डंडे पर सवारी का जमाना, जब एक पैर इस तरफ, दूसरा उस तरफ – जैसे कोई करतब दिखा रहे हों।
हमारे गांव में एक लड़का था, हम उसे प्यार से चिड़ीमार कहते थे। वो साइकिल पर ऐसे-ऐसे स्टंट करता था कि हमें भी लगता – “हम भी करेंगे कुछ ऐसा ही”। फिर शुरू हुआ उलटी क्रेंची, बिना हाथ चलाना, पिछली सीट पर बैठकर या हैंडल पर पैर रखकर चलाना। साइकिल तब सिर्फ एक सवारी का साधन नहीं, हमारी आज़ादी की उड़ान बन चुकी थी।
फिर समय बदला।
साल था 2004। मैं चंडीगढ़ के सेक्टर 16 में नौकरी करने लगा था। ऑफिस पहले सेक्टर 22 में था। तब कंप्यूटर मेरे लिए एक नई दुनिया था। मैं घंटों बैठकर कुछ नया सीखता रहता था। शनिवार की रातें अक्सर ऑफिस में कंप्यूटर पर बीततीं – कभी Photoshop, कभी Excel, कभी CorelDRAW… वक्त कैसे बीतता, पता ही नहीं चलता।
इतवार को जब घर नहीं जाना होता, तो मेरे जीजा जी की बोलेरो गाड़ी, जो ऑफिस में खड़ी रहती थी, मुझे खींचने लगती थी। मैं अकेला गाड़ी निकाल लेता और पूरे सेक्टर 16 की गलियों में घूम आता।
एक दिन गलती से मारुति की खड़ी गाड़ी में हल्का सा धक्का लग गया। खिड़की पर छोटा सा डेंट पड़ गया, लेकिन किसी ने देखा नहीं। डर के मारे मैं चुपचाप अंदर चला गया। पर उसी घटना ने मुझे हिम्मत भी दी कि अब मैं गाड़ी चला सकता हूँ। धीरे-धीरे जीजा जी को बताया और फिर वो भी मान गए कि मैं अब ड्राइविंग में माहिर हो गया हूँ।
हालांकि कई बार दुर्घटनाएं भी हुईं, लेकिन ज़िंदगी ने हर बार कुछ नया सिखाया।
अब जब कभी अकेले बैठता हूँ, तो दिल करता है –
"फिर से चलाऊँ वो क्रेंची वाली साइकिल, फिर से चोरी-छिपे गाड़ी चलाऊँ, फिर से खो जाऊँ उन बेफिक्र दिनों में।"

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