गोबर की होली... छी छी! (एक यादगार देसी किस्सा)
होली का नाम आते ही रंग-बिरंगे गुलाल, पानी की पिचकारियां, और ठहाकों की आवाज़ें मन में गूंजने लगती हैं। पर सच पूछो तो होली का असली मजा सिर्फ बचपन में ही आता है। बिना किसी हिचकिचाहट के किसी के भी ऊपर रंग उछाल देते थे। अब तो लोगों के पास वक्त भी नहीं, और अगर है भी तो वो “हम रंग नहीं डालते और न किसी से डलवाते हैं” वाला रुख अपनाए रहते हैं।
लेकिन इस बार जो होली मैंने देखी, वैसी होली पहले कभी नहीं देखी थी।
गांव की होली... और वो भी गोबर वाली!
हाँ हाँ... वही गोबर, जिसे लोग जूते में लग जाए तो घृणा से मुंह बना लेते हैं, वो गोबर यहां होली में सर से पाँव तक उड़ाया जा रहा था। गांव की गलियों में लोग गोबर घोल-घोलकर दूसरों पर डाल रहे थे — ना शर्म, ना संकोच, ना झिझक। और इस गोबर की होली में फंस गया हमारा एक शहरी रिश्तेदार — सुखबीर।
सुखबीर, ताया जी के बेटे का साला, होली के दिन अचानक हमारे गांव पहुंच गया। और बस, फिर तो क्या था! हम सबकी निगाहें उसी पर टिकी थीं। चाचा के बेटे राजेश की पत्नी ने आंगन में पहले ही गोबर का पूरा इंतज़ाम कर रखा था — बाल्टी में घोला हुआ, बिल्कुल तैयार!
सुखबीर जैसे ही गली से निकला, सब बोले — "आ गया सुखबीर, पकड़ लो, जाने ना पाए!"
लेकिन हम भी भला कोई अनाड़ी थे? रिश्तेदार का लिहाज़ कर रहे थे, सिर्फ छेड़खानी कर रहे थे। पर हुज़ूर, शुरुआत तो उसी ने कर दी। एक मग पानी भर के हमारे ऊपर डाल गया और खुद जाकर कमरे में छिप बैठा।
फिर क्या था... अब तो हम भी तैयार हो गए — “जैसी करनी वैसी भरनी”।
किसी तरह उसे कमरे से बाहर खींच लाए। पहले उसके मुंह पर गुलाल लगाया, फिर खींचते-खींचते उसे आंगन के उस हिस्से में ले आए जहां गोबर फैला हुआ था। वहां मैंने उसे नीचे बैठा लिया और खुद भी गोबर में बैठ गया। मेरे कपड़े तो पहले से गोबर में रंगे हुए थे, अब उसका सफेद कुरता-पायजामा भी उसी रंग में रंग गया।
राजेश की पत्नी तो तैयार ही खड़ी थी — गोबर का भरा गिलास लेकर, जैसे ही मौका मिले — उड़ेल दे। पर मुझे सब भनक लग जाती, और मैं पहले ही जाकर पानी डाल देता।
खेल चलता रहा... सुखबीर भी कहां मानने वाला था! एक डिब्बा गोबर भर कर मेरे छोटे भाई की बीवी की ओर फेंका — लेकिन मैं पीछे ही खड़ा था। फट से पानी की बाल्टी उड़ेली, और उसका गोबर, उसी पर उल्टा जा गिरा!
जब उसने फिर भी हार नहीं मानी, तो हमने भी कसम खा ली — “अब इसे पूरी तरह लिबेड़ना है!”
और बस फिर क्या था — गोबर, पानी, ठहाके और खिलखिलाहटें...
उस दिन की होली अब मेरे लिए सिर्फ होली नहीं, एक यादगार किस्सा बन गई है —
जहां रंग नहीं थे, पर रँगीनियाँ थीं। जहां गुलाल नहीं था, पर हंसी के फव्वारे थे।
जहां झिझक नहीं थी, सिर्फ अपनापन था — देसी, देहाती और दिल से।

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