✍️ लेखक: L. Suresh Kumar
गाँव के दिन कुछ और ही होते थे, और उनमें भी खेतों की मेड़ पर बैठकर खाया गया गुड़-चना — वो तो जैसे बचपन का सबसे स्वादिष्ट भोज होता था।
ये वो ज़माना था जब न फास्ट फूड था, न होटल की चमक-दमक... लेकिन मेड़ पर बैठकर जो स्वाद मिलता, वो आज लाखों की थाली में भी नहीं।
बात तब की है जब हम छोटे थे। गाँव के स्कूल की छुट्टी होते ही हम दौड़ते हुए खेतों की ओर भागते। स्कूल के बस्ते खेत की मेड़ पर फेंकते और कभी कीचड़ में तो कभी मेंड़ पर उछलते-कूदते माँ के पास पहुँच जाते, जो खेत में काम कर रही होती। माँ के पास हमेशा एक छोटी सी पोटली होती — उसमें होता थोड़ा सा गुड़ और मुट्ठी भर भुने हुए चने।
जब दोपहर की धूप तेज हो जाती और हवा में हल्की थकावट घुलने लगती, तब माँ आवाज़ लगाती — "आ जा, थोड़ा खा ले फिर खेलियो!"
हम दौड़ते हुए आते, माँ आँचल में से गुड़-चना निकालकर हमारे हाथों में रख देती। और फिर क्या — हम सब भाई-बहन मेड़ पर बैठकर उस छोटे से नाश्ते को ऐसे खाते जैसे कोई बड़ी दावत हो।
गुड़ की मिठास और चने की कुरकुराहट के साथ मिलती थी माँ की मेहनत की गर्माहट। कहीं दूर से किसी बैल की घंटी की आवाज़ आती, तो कहीं बगल के खेत से किसी किसान की हँसी। हम हँसते, बोलते, कुछ चने हवा में उछालते, तो कुछ छुपा लेते अपने लिए।
फिर शुरू होता हमारा खेल — मेंड़ पर दौड़ना, एक-दूसरे को पकड़ना, मिट्टी में लोटना और धान की पत्तियों से लड़ाई करना। माँ हँसते हुए कहती, “बड़े हो जाओगे तो ये सब याद करोगे।” तब तो हमें लगता था कि ऐसा क्या ख़ास है इन पलों में — पर आज जब सब कुछ छूट गया है, तो वही पल सबसे प्यारे लगते हैं।
“गुड़-चने की वो दावत भले ही साधारण थी, लेकिन उसमें छुपी थी माँ की ममता, खेतों की सादगी और बचपन की वो बेफ़िक्री।
आज ना वो मेड़ बची, ना वो सोंधी हवा... लेकिन उस स्वाद की याद आज भी जुबान पर ताज़ा है।”
🧺 क्या आपने भी खेतों की मेड़ पर बैठकर कुछ ऐसा ही खाया है? या गुड़-चने की कोई याद आपके बचपन से जुड़ी हो?
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